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मंगलवार, 15 जून 2010

खिलखिलाती बूंदे

सुबह आख खुली तो लगा
किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी हो
दरवाजा खोला तो पाया
बारिश की बूंदे अपने साथ
खेलने के लिए बुला रही है
मेरे अल्हड से अलसाये से मन को
मानो ख़ुशी का इक पयाम सा मिल गया हो
मै भी उनके साथ हो लिया
कभी उन्हें  अपनी हथेलियों पर बसा लेता
कभी वो मेरी पलकों पर आकर
मेरी पलकों को बंद करने पर अमादा होती
नीचे गिरती हुई बूंदों को देखा
लगा जैसे आसमान से सरे तारे
जमी  पर आकर टिमटिमाने लगे हो
उनमे उठती हुई छोटी छोटी लहरे
एक दूसरे से मिलने के लिए बेताब हो
फूलो पर पड़ी बूंदों को देखकर ऐसा लगा
मनो किसी सुहागन ने बिंदी लगायी  हो
आसमान की तरफ आखे उठा कर देखा
कितनी दूर से चली आ रही है मेरे पास
शायद ये मेरे लिए आयीं है
साथ में कुछ संदेसा भी लायी है
एक बूंद ने मेरे कान में इठला के कहा
मुझे संभाल कर रखना अपने पास
वरना अगले बरस हम न आयेगे

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

महिला आरक्षण बिल के लिए आगे का रास्ता कठिन के साथ साथ काफी लम्बा होगा

संसद की मर्यादाओं को शर्मसार करते हुवे एक बार फिर महिला आरक्षण बिल विधेयक ने अपने इतिहास को दोहरा दिया। ९ मार्च २०१० को संसद में इस बिल ने १८६ वोटों के समर्थन और विरोध में एक वोट के साथ अपना पहला पायदान तो लांघ लिया है लेकिन इस बिल का लोकसभा व कम से कम १५ राज्यों को विधानसभाओं के साथ राष्ट्रपति द्वारा हरी झंडी पाने तक के कठिन रस्ते को पार करना अभी बाकी है। बहरहाल विधेयक में लिखा गया है की जहाँ तक संभव हो सके लोकसभा व विधान सभाओं में दिल्ली सहित महिलाओं के लिए ३३ प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है। लोकसभा व विधान सभाओं में एससी एसटी के लिए आरक्षित कुल सीटों में से एक तिहाई एससी एसटी महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। लोकसभा में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का बटवारा राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन प्रडाली के जरिये किया जा सकता है यानी एक बार महिला उम्मेदवार फिर पुरुष उम्मीदवारऔर फिर महिला उम्मीदवार व फिर पुरुष उम्मीदवार को सीट दी जायेगी। वहीँ सभी राज्यों की विधान सभाओं की प्रत्यक्ष निर्वाचन के जरिये भरी जाने वाली सभी सीटों में से एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। ये सब बातें विधेयक के मुक्क्य बिंदु हैं लेकिन इन्हीं बिदुओं से उठी कुछ बातें जनता के मन को बार बार कचोड रहे हैं की ३३ प्रतिशत का मानदंड पूर करने के लिए करीब आधी सीटों को दोहरी सदस्यता प्रदान करनी होगी जिससे सांसदों की संख्या में ५० फीसदी बढ़ोत्तरी होजाएगी और ये नीता गन अपने कार्यों के प्रति कितने सजग हैं ये किसी से नहीं छुपा है, तो ऐसी स्थिति में क्या संसद के कामकाज और ज्यादा मुश्किल नहीं हो जायेंगे और अगर बात करें रोटेशन प्रडाली की तो किसी भी सांसद ये विधायक की अपने क्षेत्र में काम करने की काफी प्रबल इच्छा होती है ताकि अगली बार भी वह चुनाव जीतकर सांसद या विधायक बन सके हलाकि इसमें भी उसका स्वार्थ अवश्य छुपा होता है लेकिन वोट पाने के लिए वह उस क्षेत्र के विकास पर अवश्य ध्यान देगा लेकिन रोटेशन प्रडाली के मुताबिक उसे दुबारा उस क्षेत्र से चुनाव ही नहीं लड़ने को मिलेगा जिससे कहीं न कहीं उस नेता के मान को क्षति पहुँच सकती है और यही मार एक ही पार्टी के नेताओं में कोल्ड वार का रूप ले सकती है और तब स्थिति अधिक भयावह हो सकती है। वैसे पंचायती राज मंत्रालय द्वारा किये गए एक अध्धयन में सिफारिश की गयी थी की पंचायत स्तर पर निर्वाचन क्षेत्रों को रोटेशन बंद कर देना चाहिए। इसका कारण यह पाया गया की केवल १५ फीसदी महिलायें ही दुबारा चुनाव जीत पायीं क्यूंकि जिन सीटों से उन्होंने पहले जीत हासिल की थी वे गैर आरक्षित हो गयी थीं। इसके अतिरिक्त जहाँ बिल का समर्थन कर रही पार्टियों ने, राजनीति में भी महिलाओं को पूर्ण भागीदारी का अवसर मिलेऔर वो भी देश की सत्ता अपने हाथों में ले सकेंगी जैसी बातों हो ढाल बनाकर तमाम तरह की मान्यताओं को शर्मसार व अपमानित करने के बाद बड़ी मिन्नतों से संसद में जिस विधेय को पारित करवाया उसी विधेय में लिखा है की महिला आरक्षण अधिनियम लागू होने के १५ साल बाद महिलाओं से लिए सीटों का आरक्षण समाप्त हो जाएगा और यही बात लोगों के गले से नीचे नहीं उतर रही है की जिस बिल के लिए इन पार्टियों ने इतने जतन किये उन्हीं ने क्यूँ महिलाओं को राजनीति में केवल १५ साल तक ही टिकने की मोहलत दे डाली? वैसे ९ मार्च के पहले के दो दिनों में बिल विरोधी नेताओं ने चेयरमैन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के हाथों से बिल की प्रतिलिपि छीन उसके टुकड़े हवा में उछालकर व स्पीकर का माइक तोडकर जिसतरह से संसद में विधायकों व सांसदों ने जो गुल खिलाये उससे साफ़ अनुमाल लगाया जा सकता है की महिला आरक्षण बिल के लिए अग्गे का रास्ता कठिन के साथ साथ काफी लंबा भी है.

शनिवार, 13 मार्च 2010

सखी सइयां तो रोज ही कमात है, महंगाई डायन खाए जात है

सखी सइयां तो रोज ही कमात है, महंगाई डायन खाए जात है - ये गीत अब एक लोक गीत बन क़र नहीं रह गया है। अभी तक ये सिर्फ गीत के तौर पर लोगो के बीच चर्चा में था लेकिन अब इसका इस्तेमाल रजनीति आग में घी के रूप में किया जाने लगा है। महंगाई मुद्दा नेताओं के लिए राजनीति में सियासी दांव पेंच खेलने का मोहरा सा बन गया है। चाहे संसद की बात की जाये या भाजपा की पत्रिका की विपक्षी दल के वरिष्ठ नेता केन्द्रीय सरकार पर किसी भी प्रकार की छीटा कासी और टीका टिप्पड़ी करने से नहीं चूक रहे है। कांग्रेस पार्टी की पुनः निर्वाचित अध्यक्ष सोनिया गाँधी को महंगाई डायन की संज्ञा से महिमा मंडित तक कर डाला गया। वैसे गत माह पूर्व से ही महंगाई से त्रस्त जनता में इसका रोष देखने को मिल रहा है। कहीं विरोध प्रदर्शन करते दिखते है तो कहीं आगजनी करते मिलते है। बहरहाल लोगों का उग्र होना भी स्वाभाविक है क्यूंकि पेट्रोल, घरेलू गैस, बिजली, सब्जी, अनाज आदि के दाम अचानक जो आसमान छूने लगे है। मेरे ख्याल से सरकार इस रोष से बच सकती थी अगर वह इन सभी के दाम एक एक करके और थोडा थोडा करके बढाती।

महंगाई का रोना तो सरकार और जनता सभी ने रोया लेकिन शायद की किसी ने बढती महंगाई के पीछे छिपे कारणों को खंगालने की कोशिश की हो। अगर की होती तो पता चल जाता की महंगाई के सबसे बड़े दोषी हम है, पता चल जाता की अब वस्तुओं के दाम गिरने तो मुश्किल है, हाँ आगामी वर्षों में वस्तुओं के दाम बढ़ने के आसार जूर नजर आरहे है।
आज़ादी से पहले देश में लोगों की आबादी के बराबर मवेशी थे। इसलिए वस्तुओं की खपत कम और प्रर्याप्त जैविक खाद के चलते कृषि सफल थी लेकिन अब तो हम लोग ग्लोब्लाइज्द हो गए है। आज लोग खुद को दिखावे की चादर से ढकना ज्यादा पसंद करते है। पश्चीमी देशों के सामने खुद को आधुनिक दिखाने के चक्कर में लोगों ने जैविक कृषि का गला घोंट दिया और मिटटी को जहर यानी रासायनिक खाद्य खिलाना शुरू कर दिया। रवि और खरीफ फसलों का चक्र बिगड़ गया। नतीजतन कुछ वर्षों में फसलों की पैदावार कम हो गयी। इधर मशरूम की तरह जगह जगह पर लोगो की बढती आबादी के नयी समस्या बन कर सामने आई है। आबादी मतलब मांग और मांग तो तब पूरी होगी जब बाजार में पर्याप्त उत्पाद हो। याही दशा है जब सरकार मजबूर होकर बाजार में वस्तुओं की खरीद को रोकने व लोगों के बीच मारामारी को कम करने के लिए दाम बढ़ा देती है।
याद हो २००८ में भारत में ६२१ में से २७२ जिले सूखा ग्रसित घोषित किये गए थे, उस वर्ष वर्षा बहुत कम हुई थी जिससे २३ प्रतिशत फसल प्रभावित हो गयी थी. ये एक बड़ी समस्या थी. जिसकी जिम्मेदारी सरकार के कन्धों पर थी. कृत्रिम वर्ष करा पाने में असमर्थ सरकार के पास बस एक रास्ता था, दाम बढ़ा दिए।
वो दिन आज भी मुझे याद है जब केंद्र सरकार के कर्मचारियों के मुख पर ख़ुशी दिखाई दे रही थी क्यूंकि छठा वेतन आयोग जो लगने वाला था। सभी कॉग्रेस की जय जयकार कर रहे थे लेकिन इसमें मुझे कोई ख़ुशी की बात नजर नहीं आ रही थी क्यूंकि अगर सरकार जनता के लिए अपना धनकोष खली कर रही है तो उसे भरने के लिए भी जनता से रुपया वसूले गी। मतलब एक बार फिर महंगाई। महंगाई से सीधे अर्थ निकलता है की जनता की जेबें ढीली होना। अब ये सरकार का हुनर है की वह किस तरह से लोगों की जेबों से पैसा निकलवाती है।
सरकार होम लोन, कार लोन, शिक्षा लोन कम करके, ब्याज दर, रिवर्स रेट व रिवर्स रेपो रेट या वस्तुओं के दाम बढाकर किसी भी तरीके से संतुलन स्थापित करने की कोशिश करती है।
"अर्थव्यवस्था एक ऐसा भ्रम व जाल है जिसमें फसने के बाद हेर शख्स यही कहता है की महंगाई डायन खाए जात है."

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

सूचना के अधिकार को खोखला करने की कोशिस

हम उस लोक्तान्तिक देश में रहते हैं जहाँ पर हर सख्क्स को अपनी बात कहने और किसी बात को जाने की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त है और इसी आजादी के तहत राजस्थान के भुग्तभोगी किसानो द्वारा सर्वप्रथम उस समय अपनी सरकार के खिलाफ सूचना दाने के सम्बन्ध में एक आन्दोलन को जनम दिया गया जब १९९० में वहां की सरकार ने अपने वायदों से परे उन्हें कार्य के बदले मजूरी देने के सम्बन्ध में धोखा दिया था। बहरहाल किसानो के अथक प्रयासों के बात ५ वर्ष पूर्व हमें यह अधिकार प्राप्त हो सका है। सूचना का अधिकार अधिनियम जम्मू और कश्मीर को चोअद्कर पूरे देश को समर्पित है।
वैसे इस देश रीती भी भुत अजीब है जब कभी कोई सकारात्मक विचारधारा समाज में पनपना शुरू ही करती है तभी हजारों हाँथ उसे काटने के लिए खड़े हो जाते है। वही जब बात संविधानी जनतंत्र की आती है तो यह हमेशा देखने को मिलता है की एक हाँथ से जहाँ लोगों को तमाम तरह के अधिकार मुहैया कराये जाते है वहीँ दूरारे हाँथ से उन्हें छीनने के तमाम जतन भी शुरू हो जाते हैं और ऐया ही कुछ कार्मिक मंत्रालय क़ानून संसोधन की आड़ लेकर सूचना के अधिकार को खोखला करने की कोशिस कर रहा है। मंत्रलय के अपने पहले प्रस्तावित संसोधन में यह मांग की की वो उन आवेदनों के चयन के लिए बाध्य नही होगा जो अर्थपूर्ण नही होंगे। अगर ये संशोधन लागू हो गया तो यह तये है की अगर कोई नागरिक अपने जान की रक्षाअपनी, राशन की दूकान में राशन न होने अपने इलाके की सड़क न बन्ने विकास कार्यों में काम करने के बावजूद म्स्त्टर रोल में दर्ज अपनी मजूरी न मिलने अपने गाव अपने शहर में खर्च सरकारी रकन के बारे में कोई जानकारी चाहे गा तो उसके आवेदन को ख़ारिज करते समय इस विभाग के आलाल्धिकारियों के हाँथ नही कांपेंगे। उधर अपने दूसरे प्राश्तावित संसोधन में फाइल नोटिंग दखने के नागरिक के उस अधिकार को छीनने की बात कही गई जिसके तहत देश का प्रत्येइक यह जान सकता है की कोई सरकारी निर्णय सही और तर्कसंगत आधार पर जनता के हित में लिया गया है या फिर उसके पीछे भी भ्रश्त्ताचार जैसे असंगत और स्वहित वाले आधार है। मंत्रालय का यह रवैया तब है जब वह स्वयं अपने एक अध्धयन यह कहता है की १०४ करोर की इस आबादी वाले देश में मात्र १५ प्रतिशत ऐसे भारतीय हैं जिन्होंने अबतक इस अधिकार के तहत सिर्फ़ इस बात से अनुमान लगाया जा सकता है की ये नौकर शाही अपने कर्तव के पार्टी कितने समर्पित है। जो मात्र १५ प्रतिशत भारतियों की जवाब देहि से कतरा रहे हैं। उधर एक परिवर्तन का चौका देने वाला आकडा से भी बता है की इन १५ प्रतिशत लोगों में भी मात्र १/४ यानी २७ फिश्दी ऐसे व्यक्ति हैं जो संतोष प्रद उत्तर हासिल कर पायें है। मैं अपनी इस बात को यहीं ख़त्म करते हुए मैं एक प्रशन आप लोगों से करना चाहता हूँ की अगर वास्तव में सूचना का अधिकार कानून देश में पारदर्शिता और स्वचंदिता स्थापित करने के इरादे से जनता को मुहैया कराया गया हैं तो क्या वास्तव में इन शंसोधानो के बाद देश में पारदर्शिता व सव्चंदिता स्थापित करने का सपना पूरा हो पायेगा? मेरी इस बात पर भी विशेस ध्यान दीजियेगा - एक रिपोर्ट के अनुसार कर्नाटक सरकार ने पिचले वर्ष २००८ में ५० हजार से अधिक मामलों पर आदेश जारी कर सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सूचनाएँ प्रदान करने में प्रथम स्थान प्राप्त किया है तो आखिर हम में ऐसी क्या कमी है जो हम इस अधिकार का उपयोग नही कर पा रहे हैं और नौकर शाही उन गिनेचुने आवेदनों का भी जवाब देने को तैयार नही है।

"हम वो किसान हैं जो अपनी फसल ख़ुद तैयार करते हैं ख़ुद काटते हैं और ख़ुद उस अनाज को पाकर खाते है तो अगर इस प्रकिरिया में कोई अव्यवस्थ पैदा होती है तो उसके भी जिम्मदार हम स्वयं होंगे "

बुधवार, 20 जनवरी 2010

सवालों के घेरे में आडवानी सरकार

भाजपा सरकार का आरोप है की पार्टी की 30 साल से सेवा कर रहे पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने अपनी पुस्तक "जिन्नाह भारत विभाजन के आईने में " में जिन्नाह को महिमा मंडित कर सरदार वल्लभ पतिएल की छवि धूमिल किया है जिसके चले भाजपा पार्टी से उन्हें इस तर्ज पर विदा कर दिया की किसी भी सदस्य को पार्टी की केंद्रीय विचारधारा के खिलाफ लिखने का अधिकार नै है इधर पार्टी से निष्कासित होने के बाद जसवंत सिंह ने कहा की मुझे नै मालुम की वे किस मूल आस्था की बात कर रहे है और मैंने पार्टी की किस मुख्या मान्यता को क्षति पहुन्चैय है साथ ही आडवानी पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा की पटेल ही सबसे पहले नेता थे जिन्होंने मुस्लिम लीग की बजाये आर एस एस को प्रतिबंधित किया था और आर एस एस कार्यकर्ता को जेल में डाला था बहरहाल जसवंत की इस बात से साफ़ जाहिर होता है की पटेल गी मुस्लिम समर्थक थे तो फिर क्यूँ हिन्दित्व का डंका पीटने वाली भाजपा पटेल का समर्थन कर रही है ?
और अगर भाजपा मुसलिम समर्थक भी है तो ये प्रश्न उठता है की गुजरात दंगों के समय आडवानी ने दंगों के दोषी नरेन्द्र मूडी को कोई करवाई लेने से अटल बीहारी बाजपाई जी को क्यूँ रोक दिया था ? जबकि उस समय वह एवं पूरा देश इस बात से वाकिफ था की नरेंद्र मूडी ही थे जिन्होंने पार्टी के स्वयं सेवकों व संघ के लोगों को मुस्लिमून के खिलाफ भड़काकर उन्हों तीन दिन तक नरसंघार करने की छूट दी थी .
जिससे इन दंगों में लगभग दो हजार मुसलमानों की बलि चदा दी गयी थी की और अगर आडवानी सरकार भारत को सेकुलर मानते हुवे यह कहती है की जसवंत सिंह ने भारत की महान विभूती वल्लभ भाई पटेल के देश के लिए अथक प्रयासों को भूलकर निंदा की है
जिस कारण उन्हें पार्टी से रुखसत कर दिया गया है तो बात यह उठती है की भाजपा उस समय कहाँ गयी थी जिस समय उन्हीं की पार्टी के युवा नेता वरुण गाँधी ने पीलीभीत में चुनाव के दौर्रण एक सभा को संबोधित करते हुवे गाँधी जी की इज्जत को सरे आम धोमिल कर दिया था
उस समय भाजपा के दिल में भारत की महान विभूति के प्रति कोई आदर सत्कार नै था . आडवानी सरकार अगर इन सभी दलीलों को मूल से ख़ारिज कर में डटी है .
तो जसवंत सिंह से पार्टी की सेवा चीनने का केवल उनके पास एक ही कारण रह जाता है की पार्टी यह पहले से ही विचार बना लिया था की जसवंत सिंह को अब जल्द ही पार्टी से रिटायर कर देना चाहिए अब इस बात से तो पार्टी ही ज्यादा वाकिफ होगी की अपनी किताब में जिन्नाह को हीरो बनाना के इल्जाम में जसवंत को पार्टी से हाँथ धोना पड़ा या फिर लोकसभा चुनाव की करारी मार झेलने के बाद हार का गुस्सा उन पर उतारा गया है .
बहरहाल अगर जसवंत सिंह की बात की जाए तो अब अपनी खीज भाजपा पर उतारने के लिए जसवंत सिंह घर का भेदी लंका धाये की नीति का रूप अख्तियार कर लिया है सभी ये जानते है की शतरंग के खेल में एक वजीर की तरह जसवंत सिंह का स्थान भाजपा में था . इस बात का खामियाजा भाजपा ने भुगतना भी शुरू भी कर दिया है और इस बात की पुस्ती तब हुयी जब जसवंत सिंह ने कहा की प्रधान मंत्र पद की महत्व्कांचा के चलते आडवानी के आदेश पर ही संसद में सांसदों ने नोट की गद्दी लहराकर सभा खंडित की गयी थी
इधर जसवंत सिंह के बाद जहाँ अरुण शीरी , बीसी खान्दोदी के बाद अब यशवंत सिन्हा ने पार्टी के नेत्रत्वा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया वहीँ आडवानी के उठाये गए इस कदम ने भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के ऊपर उनके पद के लिए तलवार लटका दी है अंत में इन सभी बातों का निष्कर्ष यह निकलता है की राजनीति की परीक्षा में फेल होते दिख रहे हैं