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शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

आखिर कौन उठायेगा तानाशाही के विरूद्ध मुहिम?

ये घटना किसी एक किसान, किसी एक गांव या फिर किसी एक इलाके की नहीं है बल्कि ये किसी भी ऐसी जगह घटित हो सकती है जहां सरकारी पदासीन या उच्च वर्ग के लोगों का स्तर निम्न वर्ग के लोगों की तुलना में इतना बड़ा हो जाये कि वे निम्नवर्ग के लोगों की जान की कीमत पैसों से भी छोटी समझने लगें?
ब्रिजीश   नगर निवासी एक किसान शिवप्रसाद ने बैंक से 4,80,000 का लोन लिया था, जिसको उसे ब्याज सहित लगभग 10 लाख चुकाना था। इस वर्ष जहां एक तरफ सर्दी के कारण उसकी सारी फसल जिसमें 4 एकड़ में चने, 1 एकड़ में सब्जी और 3 एकड़ में बोया गेहूं नष्ट हो गया वहीं दूसरी तरफ उसी गांव की महाराष्ट ऑफ बैंक के मैनेजर राजकुमार अहिरवार का लोन के चलते बीते 3 महीनों से किसी भी समय घर पर आकर डराना-धमकाना शिवप्रसाद  के मानसिक तनाव का कारण बना और उसने मौत का विकल्प चुना। घटना के दिन दोपहर 2 बजे भी अहिरवार शिवप्रसाद  से मिला और शाम  4 बजे षिवप्रसाद की लाष घर से थोड़ी दूर कुयें के पास मिली। इस सारे घटनाक्रम के बाद ये कह पाना मुश्किल  था, कि आखिर घटना का जिम्मेदार है कौन?
वो बैंक मैनेजर, जो घटना के बाद से ही छुट्टी पर चला गया और जिसका जवाब देने के लिये कोई तैयार नहीं या फिर सरकार की तरफ से पर्याप्त सुविधाएँ  उपलब्ध न कराये जाने से फसल का नष्ट होना, क्योंकि उस गांव में बिजली रात 12 बजे  के बाद आती है और सुबह 6-7 बजे तक चली जाती है, जिस समय में खेत को न तो सींचा जा सकता है न ही और कुछ काम किया जा सकता है। वहीं अगर सिंचाई के लिये पानी की बात करें; तो गांव के लोगों को बारिश  का इंतजार करना पड़ता है, जिससे वे लोग कुंयें में पानी बचाकर रखते हैं। इतनी सारी कठिनाइयों और असुविधओं के बीच जीते और देष में अन्न उपलब्ध कराने वाले इन किसानों की तरफ सरकार का ध्यान क्यों नहीं गया और दिन-ब-दिन बढ़ती किसान आत्महत्याओं के चलते अगर ध्यान गया भी, तो किसानों को मिला क्या-‘वादे और दिलासा’ !
 जी  हां! घटना के बाद दिलासा देने पहुंचे राजस्व मंत्री करनासिंह वर्मा ने बैंक लोन माफ करने के साथ-साथ बच्चों की मुफ्त  पढ़ाई और साथ में मुआवजा दिलवाने के वादे किये। जिसके एक हफता बीत जाने के बाद भी इस पर कोई कदम नहीं उठाया गया है। सबसे बड़ी विडम्बना है, कि बजाय उस परिवार या उसके जैसे परिवारों की सहायता करने के अगले दिन अखबार में आत्महत्या करने का कारण दिमागी रूप से असंतुलित होना बताया जाता है वो भी सरपंच रामसिंह वर्मा जो कि भाजपा पार्टी से संबंधित है उनके कहने पर कलक्टर द्वारा ये बयान दिया गया था। सरपंच, जो 10 से 15 दिन में भी शायद   ही शिवप्रसाद से मिलते होंगे, वहीं उससे रोजाना मिलने वालों के बयान को प्रशासन  या अखबार में कोई जगह नहीं मिलीं। एक परिवार या ऐसे कई परिवार जिन्हें आर्थिक सहायता की जगह मानसिक सहायता तो दूर, सही तरह से न्याय भी नहीं मिला; उल्टा मरने वालों को ही उसकी मौत का जिम्मेदार ठहरा दिया गया। जिससे षायद कोई संतुष्ट नहीं है सिवाय उन लोगों के जो असल में इसके जिम्मेदार है और सत्ता और शक्ति  भी उन्हीं के हाथ में है। लेकिन प्रष्न ये उठता है कि इनके खिलाफ आवाज कौन उठायेगा? हम या आप में से कोई! तो फिर क्यों पहल का इंतजार किया जाता है और फिर नई घटनाओं के घटित होने के बाद इन्हें भी भुला दिया जाता है। अगर ऐसी घटनाओं को अंजाम तक पहुंचाना हो या फिर दोहराव से बचाना हो, तो पहल हम में से ही किसी को करनी होगी? 

शनिवार, 20 नवंबर 2010

नौकरशाह, राष्ट्रामंडल खेल और भारतीय खिलाड़ी

 

1930 एक ऐसा दौर जब भारत गुलामी जन्जीरों को तोड़ने के लिए अपने बाजू मजबूत कर रहा था। भारत की हर गली आन्दोलकारियों की आवाज से गूंज रही थी। वहीं कैनेडा के एक शहर में राष्ट्रमण्डल खेलों की शुरूआत हुई थी। चौदह देशों के करीब 400 खिलाड़ियों ने छः खेलों में प्रतिभाग किया था। उस समय भारत ऐसे दौर से गुजर रहा था कि उसने ये सोचा भी नहीं होगा कि वह कभी राष्ट्रमण्डल खेलों की मेजबानी भी करेगा। लेकिन मात्र 21 साल के अन्दर भारत को ये मौका मिला उसके बाद १९८२ में। क्यों? शायद इसलिए कि भारत ने विश्व पर बहुत जल्दी अपनी एक अलग और प्रभावशाली छाप डाली है। इस वर्ष राष्ट्रमण्डल खेलों की शुरूआत भारत की राजधानी और दिल वालों के शहर दिल्ली में 3 अक्टूबर को हुई जो कि 13 अक्टूबर तक चले, जिसमें 71 राष्ट्र के 6700 प्रतिभागियों ने 17 खेलों के लिए भाग लिया। भारतियों में उस समय खुशी की लहर दौड़ गयी जब 2003 में भारत को वर्ष 2010 में राष्ट्रमण्डल खेलों की मेजबानी के लिए चुना गया। कहते हैं न कि हाथी के दांत खाने के कुछ और दिखाने के कुछ और होते हैं असल में भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष समेत अन्य सदस्यों के चहरे पर जो खुशी झलक रही थी उसका मुख्य कारण मेजबानी हासिल करने के पीछे छिपी शकुनी चाल का पहला चरण पार करने की थी। मतलब सभी अपने धन को कुबेर धन में तब्दील करने के सपने को साकार होता देख, खुश हो रहे थे। इन खेलों के बजट की गिनती बढ़ते-बढ़ते करीब 70000 करोड़ रूपये जा पहुंची है। कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर इस आंकड़े के आकार को समझाने के लिए इसकी तुलना देश भर के किसानों की कर्ज माफी पर खर्च करीब 65 हजार करोड़ रूपये से करते हैं तो कई लोग इसे केन्द्र सरकार के सालाना शिक्षा बजट से बड़ी राशि बताते हैं। एक बात यह भी सुनने में आती है कि खेलों के बदले जनता का पैसा लुटाने का सिलसिला भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष और राष्ट्रमण्डल खेल आयोजन समिति के महासचिव सुरेश कलमाडी ने वर्ष 2003 में जमैका में लगी बोली से शुरू कर दिया था। भारत की दावेदारी को मजबूत करने के लिए कलमाडी ने अपनी मर्जी से हरेक प्रतिभागी देश को एक-एक लाख डॉलर देने की पेशकश करी थी। भारत को वर्ष 2010 राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी मिलने में इस पेशकश ने अहम भूमिका निभाई। उस समय खेल मंत्री रहे भाजपा के विक्रम वर्मा कहते हैं ‘‘राष्ट्रमण्डल के सदस्य देशों को करीब 50-50 लाख रूपये देने की पेशकश कलमाडी का व्यक्तिगत निर्णय था। दरअसल यह मेजबानी हासिल करने के लिए दी जाने वाली रिश्वत थी।’’मेजबानी तो मिल गयी लेकिन वर्ष 2003 में मेजबानी मिलने के बाद वर्ष 2005 तक न तो भारतीय ओलंपिक संघ और न ही खेल मंत्रालय ने आयोजन को लेकर किसी भी तरह की तैयारी को आगे बढ़ाया। आयोजन के दावों और वादों के बीच चार साल निकल गये। आयोजन समिति का सचिवालय भी वर्ष 2007 में सुचारू हुआ। इसके बाद शुरू हुआ तैयारियों के बजाए खेलों के नाम पर ज्यादा से ज्यादा खर्च और कमाई से नए-नए तरीके निकालने का खेल। आयोजन का मास्टर प्लान तो वर्ष 2008 के आखिर में तैयार हुआ। इस देरी ने अटके कामों को पूरा करने का खर्च और धांधली की गुंजाइश दोनों को बढ़ा दिया। पिछले साल तक भी जमीनी तैयारियों पटरी पर नहीं दिखीं तो राष्ट्रमंडल खेल महासंघ के अध्यक्ष माइकल फेनेल ने इस सम्बन्धन प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी और अपनी चिंता जतायी। इसी बीच मीडिया ने राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार की कलाई खोलनी शुरू कर दी उदाहरण के तौर पर- पूर्व केन्द्रीय मन्त्री मणिशंकर अय्यर ने मीडिया में इस मुद्दे के उछलने के बाद खूलासा किया कि सुरेश कलमाडी ने 2003 में इन खेलों पर सिर्फ 150 करोड़ रूपये का खर्च आने की बात कही थी लेकिन अब उद् घाटन और समापन समारोह पर ही 300 करोड़ रूपये खर्च होने की बात कही गयी है।गलती तो धनलोलुप नेताओं और उनके चेलाओं ने तो जरूर की और मीडिया द्वारा, इस घोटाले का खुलासा भी होना अति आवश्यक था लेकिन ऐसे समय पर जब खेल शुरू होने में बस कुछ सप्ताह ही बाकी हों, मीडिया द्वारा इस मामले को तूल देना क्या सही था? क्योंकि मीडिया में इस मामले के उछलने के बाद विदेशों में ओलंपिक संघ के अध्यक्ष समेत भारत व भारतीय सरकार की थू-थू हुई। अब शायद ही भारत को राष्ट्रमण्डल खेल या अन्य अन्तर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं की मेजबानी के लिए अवसर मिले। वैसे ये कहा जा सकता है कि मीडिया ने नेताओं ने को नहीं छोड़ा और नेताओं ने देश को, लेकिन ऐसी स्थिति में सिर्फ एक वर्ग ही ऐसा था जिसने बिना किसी स्वार्थ, लालच के देश की शान को बरकरार रखा, देश के खिलाड़ी। खिलाड़ियों ने राष्ट्रमण्डल खेलों में कुल 101 पदक भारत के लिए प्राप्त किये। जिसमें 38 स्वर्ण, 27 रजत व 36 कांस्य हैं। बहरहाल काफी अव्यवस्थाओं के रहते हुए भी खेल सकुशल निपट गये और किसी भी घटना ने दस्तक भी नहीं दी। नहीं तो इसके पहले कई जगह निर्माण कार्य चल रहा था तो कहीं कार्य पूरा होने के बाद ढ़ांचा गिर रहा था।जो भी हो, अन्तिम समय में सरकार ने जब एक बार दम भरा तो काम पूरा करने के बाद ही सांस ली। ये बात अलग है कि एक आध छुट-पुट काम तब भी करने को बाकी रह गये थे। खिलाड़ियों की सुविधा के लिए एयरपोर्ट से ही एक अलग राजमार्ग बनवाया गया था जो खिलाड़ियों को सीधे स्टेडियम पर उतारने के लिए था। रोड के दोनों ओर बड़ी-बड़ी होर्डिंग लगवायी गयीं थी जिसमें तमाम प्रसिद्ध खिलाड़ियों की खेलते हुए तस्वीर थी, प्रसिद्ध इमारतों की तस्वीर आदि थी। उस समय तो दिल्ली मानों किसी अतिविकसित देश की भांति लग रही थी जहां न तो कहीं कूड़ा था और न ही कोई बिखारी। हां...... बिखारी! उन दिनों एक भी बिखारी दिल्ली की सड़कों पर नहीं था। ये भी सच है कि भारत में दिल्ली भी एक ऐसी जगह के तौर पर देखी जाती है जहां बिखारी बहुतायत में हैं। तो फिर ये बिखारी गये कहां? शहर से बाहर। अपनी झूठी शान बनाने के चक्कर में किसी भी बिखारी, रिक्शेवाले, ठेलेवालों को शहर में नहीं रूकने दिया गया। न ही शहर के बाहर उनके रहने खाने का कोई इन्तजाम किया गया। ऐसे में भीड़ भाड़ का तो कोई सवाल ही नहीं उठता है क्योंकि पूरा दिल्ली 10 दिन के लिए बंद करा दिया गया था।लेकिन सरकार के ये तमाम ढ़कोसले धरे के धरे रह गये। क्योंकि इस बार मीडिया ने इनकी करतूतों पर पानी फेर दिया। खेल खत्म होते ही अगले दिन भारत सरकार ने पूर्व महालेखा परीक्षक आयुक्त वी.के. शुंगलू समिति, खेलों में हुए भ्रष्टाचार की जांच के लिए गठित कर दी। इधर कई प्रकरणों के चलते विवादों में घिरी केन्द्र सरकार ने येन केन प्रकारेण सुरेश कलमाड़ी को उनके पद से मुक्त कर दिया। लेकिन प्रश्न ये उठा है कि इस तरह भारत की अस्मिता के साथ खेलने वाले व्यक्तियों की सजा सिर्फ पद से मुक्तिभर कर देना ही रह जाएगी या ऐसे आरोपियों पर कार्रवाई का ये पहला कदम माना जाए?

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

15 अगस्त ........... क्या छुट्टी का दिन ?

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर 50 प्रतिसत के भारी छूट . 15 अगस्त के मौके पर भेजिये दोस्तों को मैसेज, स्वतंत्रता दिवस पर मालामाल ऑफर ……………. ऐसे अनेक विज्ञापन हमें 15 अगस्त के कुछ दिन पहले ही हमारे दिल और दिमाग को बता देते है की आजादी का दिन हर साल की तरह इस बार भी आ गया . इसका भरपूर फायदा उठाइए और ले जाइये आजादी 50 प्रतिशत छूट पर ……….
महात्मा गांधी, भगत सिंह , राज गुरु , सुखदेव, आजाद , चाचा नेहरू …. न जाने कितने ही स्वतंत्रता सेनानियों ने इस दिन के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी . इस दिन आजाद भारत की इक तस्वीर दुनिया के सामने रखी गई । 15 अगस्त 2009 , आज के दिन के मायने लोगो के लिए बदल चुके है . सरकारी कर्मचारियों के लिए छुट्टी का दिन , नीजी कंपनियों के लिए एक पार्टी मनाने का अवसर , बाज़ार में ख़राब हो गई वस्तुओ को सस्ते दामो में निपटाने का दिन , नेताओं के लिए समाचार पत्रों में हार्दिक बधाई देने का दिन ,कुछ देश भक्ति गाने बजाने का दिन , स्कूली बच्चो को घूमने का दिन ……….. कितनी अलग सोच थी स्वतंत्रता सेनानियों की हमसे, हम फायदे की सोचते है तो स्वतंत्रता सेनानी कायदे की सोचते थे . फिर कैसे हम उनकी सोच को, उनके देखे हुए सपने को आगे ले जायेगे……ले जायेगे जैसे सब हो रहा है ये भी होगा . आख़िर 15 अगस्त के दिन देश भक्ति गाने बजाने वाले, बन्दे मातरम का नारा देने वाले, जय हो का नारा देने वाले ये तो सोचेगे ही। अपने अहले वतन के लिय ऐ ………….

मंगलवार, 15 जून 2010

खिलखिलाती बूंदे

सुबह आख खुली तो लगा
किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी हो
दरवाजा खोला तो पाया
बारिश की बूंदे अपने साथ
खेलने के लिए बुला रही है
मेरे अल्हड से अलसाये से मन को
मानो ख़ुशी का इक पयाम सा मिल गया हो
मै भी उनके साथ हो लिया
कभी उन्हें  अपनी हथेलियों पर बसा लेता
कभी वो मेरी पलकों पर आकर
मेरी पलकों को बंद करने पर अमादा होती
नीचे गिरती हुई बूंदों को देखा
लगा जैसे आसमान से सरे तारे
जमी  पर आकर टिमटिमाने लगे हो
उनमे उठती हुई छोटी छोटी लहरे
एक दूसरे से मिलने के लिए बेताब हो
फूलो पर पड़ी बूंदों को देखकर ऐसा लगा
मनो किसी सुहागन ने बिंदी लगायी  हो
आसमान की तरफ आखे उठा कर देखा
कितनी दूर से चली आ रही है मेरे पास
शायद ये मेरे लिए आयीं है
साथ में कुछ संदेसा भी लायी है
एक बूंद ने मेरे कान में इठला के कहा
मुझे संभाल कर रखना अपने पास
वरना अगले बरस हम न आयेगे

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

महिला आरक्षण बिल के लिए आगे का रास्ता कठिन के साथ साथ काफी लम्बा होगा

संसद की मर्यादाओं को शर्मसार करते हुवे एक बार फिर महिला आरक्षण बिल विधेयक ने अपने इतिहास को दोहरा दिया। ९ मार्च २०१० को संसद में इस बिल ने १८६ वोटों के समर्थन और विरोध में एक वोट के साथ अपना पहला पायदान तो लांघ लिया है लेकिन इस बिल का लोकसभा व कम से कम १५ राज्यों को विधानसभाओं के साथ राष्ट्रपति द्वारा हरी झंडी पाने तक के कठिन रस्ते को पार करना अभी बाकी है। बहरहाल विधेयक में लिखा गया है की जहाँ तक संभव हो सके लोकसभा व विधान सभाओं में दिल्ली सहित महिलाओं के लिए ३३ प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है। लोकसभा व विधान सभाओं में एससी एसटी के लिए आरक्षित कुल सीटों में से एक तिहाई एससी एसटी महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। लोकसभा में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का बटवारा राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन प्रडाली के जरिये किया जा सकता है यानी एक बार महिला उम्मेदवार फिर पुरुष उम्मीदवारऔर फिर महिला उम्मीदवार व फिर पुरुष उम्मीदवार को सीट दी जायेगी। वहीँ सभी राज्यों की विधान सभाओं की प्रत्यक्ष निर्वाचन के जरिये भरी जाने वाली सभी सीटों में से एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। ये सब बातें विधेयक के मुक्क्य बिंदु हैं लेकिन इन्हीं बिदुओं से उठी कुछ बातें जनता के मन को बार बार कचोड रहे हैं की ३३ प्रतिशत का मानदंड पूर करने के लिए करीब आधी सीटों को दोहरी सदस्यता प्रदान करनी होगी जिससे सांसदों की संख्या में ५० फीसदी बढ़ोत्तरी होजाएगी और ये नीता गन अपने कार्यों के प्रति कितने सजग हैं ये किसी से नहीं छुपा है, तो ऐसी स्थिति में क्या संसद के कामकाज और ज्यादा मुश्किल नहीं हो जायेंगे और अगर बात करें रोटेशन प्रडाली की तो किसी भी सांसद ये विधायक की अपने क्षेत्र में काम करने की काफी प्रबल इच्छा होती है ताकि अगली बार भी वह चुनाव जीतकर सांसद या विधायक बन सके हलाकि इसमें भी उसका स्वार्थ अवश्य छुपा होता है लेकिन वोट पाने के लिए वह उस क्षेत्र के विकास पर अवश्य ध्यान देगा लेकिन रोटेशन प्रडाली के मुताबिक उसे दुबारा उस क्षेत्र से चुनाव ही नहीं लड़ने को मिलेगा जिससे कहीं न कहीं उस नेता के मान को क्षति पहुँच सकती है और यही मार एक ही पार्टी के नेताओं में कोल्ड वार का रूप ले सकती है और तब स्थिति अधिक भयावह हो सकती है। वैसे पंचायती राज मंत्रालय द्वारा किये गए एक अध्धयन में सिफारिश की गयी थी की पंचायत स्तर पर निर्वाचन क्षेत्रों को रोटेशन बंद कर देना चाहिए। इसका कारण यह पाया गया की केवल १५ फीसदी महिलायें ही दुबारा चुनाव जीत पायीं क्यूंकि जिन सीटों से उन्होंने पहले जीत हासिल की थी वे गैर आरक्षित हो गयी थीं। इसके अतिरिक्त जहाँ बिल का समर्थन कर रही पार्टियों ने, राजनीति में भी महिलाओं को पूर्ण भागीदारी का अवसर मिलेऔर वो भी देश की सत्ता अपने हाथों में ले सकेंगी जैसी बातों हो ढाल बनाकर तमाम तरह की मान्यताओं को शर्मसार व अपमानित करने के बाद बड़ी मिन्नतों से संसद में जिस विधेय को पारित करवाया उसी विधेय में लिखा है की महिला आरक्षण अधिनियम लागू होने के १५ साल बाद महिलाओं से लिए सीटों का आरक्षण समाप्त हो जाएगा और यही बात लोगों के गले से नीचे नहीं उतर रही है की जिस बिल के लिए इन पार्टियों ने इतने जतन किये उन्हीं ने क्यूँ महिलाओं को राजनीति में केवल १५ साल तक ही टिकने की मोहलत दे डाली? वैसे ९ मार्च के पहले के दो दिनों में बिल विरोधी नेताओं ने चेयरमैन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के हाथों से बिल की प्रतिलिपि छीन उसके टुकड़े हवा में उछालकर व स्पीकर का माइक तोडकर जिसतरह से संसद में विधायकों व सांसदों ने जो गुल खिलाये उससे साफ़ अनुमाल लगाया जा सकता है की महिला आरक्षण बिल के लिए अग्गे का रास्ता कठिन के साथ साथ काफी लंबा भी है.

शनिवार, 13 मार्च 2010

सखी सइयां तो रोज ही कमात है, महंगाई डायन खाए जात है

सखी सइयां तो रोज ही कमात है, महंगाई डायन खाए जात है - ये गीत अब एक लोक गीत बन क़र नहीं रह गया है। अभी तक ये सिर्फ गीत के तौर पर लोगो के बीच चर्चा में था लेकिन अब इसका इस्तेमाल रजनीति आग में घी के रूप में किया जाने लगा है। महंगाई मुद्दा नेताओं के लिए राजनीति में सियासी दांव पेंच खेलने का मोहरा सा बन गया है। चाहे संसद की बात की जाये या भाजपा की पत्रिका की विपक्षी दल के वरिष्ठ नेता केन्द्रीय सरकार पर किसी भी प्रकार की छीटा कासी और टीका टिप्पड़ी करने से नहीं चूक रहे है। कांग्रेस पार्टी की पुनः निर्वाचित अध्यक्ष सोनिया गाँधी को महंगाई डायन की संज्ञा से महिमा मंडित तक कर डाला गया। वैसे गत माह पूर्व से ही महंगाई से त्रस्त जनता में इसका रोष देखने को मिल रहा है। कहीं विरोध प्रदर्शन करते दिखते है तो कहीं आगजनी करते मिलते है। बहरहाल लोगों का उग्र होना भी स्वाभाविक है क्यूंकि पेट्रोल, घरेलू गैस, बिजली, सब्जी, अनाज आदि के दाम अचानक जो आसमान छूने लगे है। मेरे ख्याल से सरकार इस रोष से बच सकती थी अगर वह इन सभी के दाम एक एक करके और थोडा थोडा करके बढाती।

महंगाई का रोना तो सरकार और जनता सभी ने रोया लेकिन शायद की किसी ने बढती महंगाई के पीछे छिपे कारणों को खंगालने की कोशिश की हो। अगर की होती तो पता चल जाता की महंगाई के सबसे बड़े दोषी हम है, पता चल जाता की अब वस्तुओं के दाम गिरने तो मुश्किल है, हाँ आगामी वर्षों में वस्तुओं के दाम बढ़ने के आसार जूर नजर आरहे है।
आज़ादी से पहले देश में लोगों की आबादी के बराबर मवेशी थे। इसलिए वस्तुओं की खपत कम और प्रर्याप्त जैविक खाद के चलते कृषि सफल थी लेकिन अब तो हम लोग ग्लोब्लाइज्द हो गए है। आज लोग खुद को दिखावे की चादर से ढकना ज्यादा पसंद करते है। पश्चीमी देशों के सामने खुद को आधुनिक दिखाने के चक्कर में लोगों ने जैविक कृषि का गला घोंट दिया और मिटटी को जहर यानी रासायनिक खाद्य खिलाना शुरू कर दिया। रवि और खरीफ फसलों का चक्र बिगड़ गया। नतीजतन कुछ वर्षों में फसलों की पैदावार कम हो गयी। इधर मशरूम की तरह जगह जगह पर लोगो की बढती आबादी के नयी समस्या बन कर सामने आई है। आबादी मतलब मांग और मांग तो तब पूरी होगी जब बाजार में पर्याप्त उत्पाद हो। याही दशा है जब सरकार मजबूर होकर बाजार में वस्तुओं की खरीद को रोकने व लोगों के बीच मारामारी को कम करने के लिए दाम बढ़ा देती है।
याद हो २००८ में भारत में ६२१ में से २७२ जिले सूखा ग्रसित घोषित किये गए थे, उस वर्ष वर्षा बहुत कम हुई थी जिससे २३ प्रतिशत फसल प्रभावित हो गयी थी. ये एक बड़ी समस्या थी. जिसकी जिम्मेदारी सरकार के कन्धों पर थी. कृत्रिम वर्ष करा पाने में असमर्थ सरकार के पास बस एक रास्ता था, दाम बढ़ा दिए।
वो दिन आज भी मुझे याद है जब केंद्र सरकार के कर्मचारियों के मुख पर ख़ुशी दिखाई दे रही थी क्यूंकि छठा वेतन आयोग जो लगने वाला था। सभी कॉग्रेस की जय जयकार कर रहे थे लेकिन इसमें मुझे कोई ख़ुशी की बात नजर नहीं आ रही थी क्यूंकि अगर सरकार जनता के लिए अपना धनकोष खली कर रही है तो उसे भरने के लिए भी जनता से रुपया वसूले गी। मतलब एक बार फिर महंगाई। महंगाई से सीधे अर्थ निकलता है की जनता की जेबें ढीली होना। अब ये सरकार का हुनर है की वह किस तरह से लोगों की जेबों से पैसा निकलवाती है।
सरकार होम लोन, कार लोन, शिक्षा लोन कम करके, ब्याज दर, रिवर्स रेट व रिवर्स रेपो रेट या वस्तुओं के दाम बढाकर किसी भी तरीके से संतुलन स्थापित करने की कोशिश करती है।
"अर्थव्यवस्था एक ऐसा भ्रम व जाल है जिसमें फसने के बाद हेर शख्स यही कहता है की महंगाई डायन खाए जात है."

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

सूचना के अधिकार को खोखला करने की कोशिस

हम उस लोक्तान्तिक देश में रहते हैं जहाँ पर हर सख्क्स को अपनी बात कहने और किसी बात को जाने की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त है और इसी आजादी के तहत राजस्थान के भुग्तभोगी किसानो द्वारा सर्वप्रथम उस समय अपनी सरकार के खिलाफ सूचना दाने के सम्बन्ध में एक आन्दोलन को जनम दिया गया जब १९९० में वहां की सरकार ने अपने वायदों से परे उन्हें कार्य के बदले मजूरी देने के सम्बन्ध में धोखा दिया था। बहरहाल किसानो के अथक प्रयासों के बात ५ वर्ष पूर्व हमें यह अधिकार प्राप्त हो सका है। सूचना का अधिकार अधिनियम जम्मू और कश्मीर को चोअद्कर पूरे देश को समर्पित है।
वैसे इस देश रीती भी भुत अजीब है जब कभी कोई सकारात्मक विचारधारा समाज में पनपना शुरू ही करती है तभी हजारों हाँथ उसे काटने के लिए खड़े हो जाते है। वही जब बात संविधानी जनतंत्र की आती है तो यह हमेशा देखने को मिलता है की एक हाँथ से जहाँ लोगों को तमाम तरह के अधिकार मुहैया कराये जाते है वहीँ दूरारे हाँथ से उन्हें छीनने के तमाम जतन भी शुरू हो जाते हैं और ऐया ही कुछ कार्मिक मंत्रालय क़ानून संसोधन की आड़ लेकर सूचना के अधिकार को खोखला करने की कोशिस कर रहा है। मंत्रलय के अपने पहले प्रस्तावित संसोधन में यह मांग की की वो उन आवेदनों के चयन के लिए बाध्य नही होगा जो अर्थपूर्ण नही होंगे। अगर ये संशोधन लागू हो गया तो यह तये है की अगर कोई नागरिक अपने जान की रक्षाअपनी, राशन की दूकान में राशन न होने अपने इलाके की सड़क न बन्ने विकास कार्यों में काम करने के बावजूद म्स्त्टर रोल में दर्ज अपनी मजूरी न मिलने अपने गाव अपने शहर में खर्च सरकारी रकन के बारे में कोई जानकारी चाहे गा तो उसके आवेदन को ख़ारिज करते समय इस विभाग के आलाल्धिकारियों के हाँथ नही कांपेंगे। उधर अपने दूसरे प्राश्तावित संसोधन में फाइल नोटिंग दखने के नागरिक के उस अधिकार को छीनने की बात कही गई जिसके तहत देश का प्रत्येइक यह जान सकता है की कोई सरकारी निर्णय सही और तर्कसंगत आधार पर जनता के हित में लिया गया है या फिर उसके पीछे भी भ्रश्त्ताचार जैसे असंगत और स्वहित वाले आधार है। मंत्रालय का यह रवैया तब है जब वह स्वयं अपने एक अध्धयन यह कहता है की १०४ करोर की इस आबादी वाले देश में मात्र १५ प्रतिशत ऐसे भारतीय हैं जिन्होंने अबतक इस अधिकार के तहत सिर्फ़ इस बात से अनुमान लगाया जा सकता है की ये नौकर शाही अपने कर्तव के पार्टी कितने समर्पित है। जो मात्र १५ प्रतिशत भारतियों की जवाब देहि से कतरा रहे हैं। उधर एक परिवर्तन का चौका देने वाला आकडा से भी बता है की इन १५ प्रतिशत लोगों में भी मात्र १/४ यानी २७ फिश्दी ऐसे व्यक्ति हैं जो संतोष प्रद उत्तर हासिल कर पायें है। मैं अपनी इस बात को यहीं ख़त्म करते हुए मैं एक प्रशन आप लोगों से करना चाहता हूँ की अगर वास्तव में सूचना का अधिकार कानून देश में पारदर्शिता और स्वचंदिता स्थापित करने के इरादे से जनता को मुहैया कराया गया हैं तो क्या वास्तव में इन शंसोधानो के बाद देश में पारदर्शिता व सव्चंदिता स्थापित करने का सपना पूरा हो पायेगा? मेरी इस बात पर भी विशेस ध्यान दीजियेगा - एक रिपोर्ट के अनुसार कर्नाटक सरकार ने पिचले वर्ष २००८ में ५० हजार से अधिक मामलों पर आदेश जारी कर सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सूचनाएँ प्रदान करने में प्रथम स्थान प्राप्त किया है तो आखिर हम में ऐसी क्या कमी है जो हम इस अधिकार का उपयोग नही कर पा रहे हैं और नौकर शाही उन गिनेचुने आवेदनों का भी जवाब देने को तैयार नही है।

"हम वो किसान हैं जो अपनी फसल ख़ुद तैयार करते हैं ख़ुद काटते हैं और ख़ुद उस अनाज को पाकर खाते है तो अगर इस प्रकिरिया में कोई अव्यवस्थ पैदा होती है तो उसके भी जिम्मदार हम स्वयं होंगे "