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रविवार, 13 मार्च 2011

संस्कृति पर खर्च मंजूर नहीं!




सुनने में अजीब लगता है कि ‘‘बदलते दौर में संस्कृति या सभ्यता की बात करने वाले को विरोध का सामना कर पड़ रहा है।’’ आज के समाज पर जरूरतें और इच्छाओं उनकी संस्कृति और सभ्यता पर हावी हाती दिखाई पड़ रही हैं और वहीं किसी व्यक्ति या समूह को दादा या बाबा की याद गई तो उसे भी चुप करने के भरसक प्रयास किये जाने षुरू हो जाते हैं। अगर अभी ज्वलंत मुद्दा का ही उदाहरण ले लें, ‘भोपाल के नाम परिवर्तित करके भोजपाल करने का।’ तो इसका विरोध किया गया। इस बड़े विरोध का मुख्य कारण था- मीडिया द्वारा  नाम बदलने का कारण मुख्यमंत्री शिवराज  सिंह चौहान ने कोई विकास का मुद्दा न होकर ‘पूर्वजों और इतिहास वीरों का सम्मान’ का सम्मान बताया। बगैर इसका कारण जाने और राजा भोज के योगदान का पता लगाये लोगों ने विरेाध जताना शुरू  कर दिया, वहीं राजनीतिज्ञ मामले को अपने पक्ष में करने की खुड़पेंच में लग गये। 
   ये बात कहीं से गलत नहीं है, कि इस वर्ष ‘म.प्र. में किसानों की बढ़ती आत्महत्या और महंगाई’ महत्त्वपूर्ण मुद्दे रहे। बस मुख्यमंत्री जी ने यहीं पर गलती कर दी कि उन्होंने अपने पूर्वजों को बिना किसी संकट या ठोस वजह के याद कर लिया। तो जनता ने भी बिना इतिहास या प्रस्ताव का कारण जाने बिना केवल एक पक्ष को देखते हुये विरोध करना शुरू  कर दिया। लोग इस मुद्दे के ऐसे पहलुओं को नकारात्मक मान रहे हैं जैसे ‘म.प्र. में किसान आत्महत्या’ जो समाज में पहले से ही था, ‘मूर्ति निर्माण’ या ‘भोपाल का नाम परिवर्तन’ न तो इन समस्याओं का कारण है और न ही इस प्रकार की पहल से समाज में व्याप्त इन समस्याओं के हल में कोई रूकावट आयेगी। इसके अलावा समाज में व्याप्त इन समस्याओं के लिये भी पर्याप्त कदम उठाये जा चुके हैं, चाहे वह ‘किसानों को दिया गया राहत कोष हो’ या ‘राज्य बजट में किसानों के लिये उपलब्ध कराई गई राशी ’। 
   वहीं अगर इस पहल के सकारात्मक पक्ष की बात करें, कि एक तो सांस्कृतिक दृष्टि से राज्य की देश  और विदेश  में एक अलग पहचान बनेगी ही और ये संस्कृति या सभ्यता की दिशा में पहल होगी। लोग भी पूर्वजों के महत्त्व को समझ पायेंगे! और तय कर पायेंगे कि उन्हें भविष्य में पहचान बनाने के लिये क्या कदम उठाने चाहिये? वहीं आर्थिक दृष्टि से देखें तो इसके प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ भोज की प्रतिमा ‘टूरिज्म’ की एक वजह बन सकती है। अब आते हैं भोज के योगदान पर तो सबसे पहले जान लें कि ‘‘कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली’’ जैसी कहावतें उन्हीं की वज़ह से समाज में आईं, जब उन्होंनें चालुक्य राजा तैलप को हराया था। इससे सिद्ध होता है, कि राजा भोज एक पराक्रमी राजा थे जिन्होंने वर्षों तक अपने इस राज्य की रक्षा की और वाह्य आक्रमणो से बचाया है। पराक्रमी होने के साथ साथ वे परम ज्ञानी भी थे, क्यूंकि उन्होंने रोबोट, लिफट,जहाज और विमान निर्माण बनाने की विधि का जिक्र अपने ग्रन्थों में किया है और अपनी रचना ‘समरांगण सूत्रधार’ में नगर रचना, भवन रचना और मुर्ति रचना का उल्लेख किया है। ऐतिहासिक महत्व के रूप में उन्होंने 84 ग्रन्थों की रचना की है, जिसके प्रमाण उज्जैन के संग्रहालय में  आज भी विद्यमान है और निर्माण के क्षेत्र में भोजपुर का महान शिव  मंदिर, उज्जैन में माण्डन का किला और तत्कालीन राजधानी धार में 42 फीट उंचा लौह स्तंभ, जिसकी खासियत है कि इस पर कभी जंग नहीं लगती, का निर्माण इन्होंने ही करवाया। वहीं अगर विकास के क्षेत्र की बात करें, तो  बेतवा नदी पर 250 वर्ग मील क्षेत्रफल का विषाल बांध राजा भोज की ही देन है। वहीं राष्टीय स्तर पर रामेश्रम , सोमनाथ, केदार, मुंडीर और चित्तौड़ का त्रिभुवन नारायण मंदिर के अलावा कश्मीर  में कप्तेस्वेर  मंदिर आदि का निर्माण कराके उन्होंने धार्मिक क्षेत्र में अपना योगदान सिद्ध किया। और अन्तर्राष्टीय स्तर भी इनके महत्त्व से अछूता नहीं है, भोजशाला  की सरस्वती प्रतिमा, इंग्लैण्ड के ब्रिटिश  म्यूजियम में रखी हैं उसे लाने के प्रयास 1961 से हो रहे हैं। अंतर्राष्टीय स्तर पर  पुरातत्वविद पद्म श्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने नेहरू जी से मुलाकात की थी। इसके अलावा उनके बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात है कि चूंकि वे वास्तुशास्त्र  के ज्ञाता थे तो उन्होंने पूरे शहर  का निर्माण वास्तुशास्त्र के अनुरूप कराया था। वहीं आज लोग ये तक बात कर रहे हैं कि उनकी मूर्ति स्थापित करना वास्तुशास्त्र  के हिसाब से ठीक नहीं है ये नगर के लिये फलदायी नहीं है । ये सब जानकर हमें विरोध की कदम न बढ़ाकर ये सुकर  मनाना चाहिये कि राजा भोज अपने राज्य की शुरूआत मालवा से करके भोपाल और मध्य प्रदेश तक विस्तार करके यहां विकास कार्य कराया और इसे उन्नत करने के साथ इसे अपना नाम दिया- ‘भोजपाल’ अर्थात् जिस स्थान को पालने वाला भोज हो। इन सब चीजों को याद करने का एक तरीका अगर जगह का नाम बदलना हो, तो इसका विरोध किया जाना कितना सही है? क्या उनके इतने योगदान के बदले उन्हें एक नाम भी नहीं दिया जा सकता। कहा जाता है कि संस्कृति और सभ्यता समाज की पहचान होती है, तो इस तरह के विरोध का क्या मतलब निकाला जा सकता है, कि समाज की आवशकताओं पहचान पर हावी हो रही है या फिर आने वाली पीढ़ी में वो खुद को स्थान नहीं देना चाहते?




गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

राजनीति से दूर रहकर करनी होगी जांच

 घोटालों का बढ़ता क्रम चाहे वह २४ साल पुराना बोफोर्स का मामला हो या हाल ही में हुआ अब तक का सबसे बड़ा घोटाला 2-जी स्पेक्टम घोटाला, तब तक अपने निष्कर्ष पर नहीं पहुंचेगा जब तक इन मामलों से राजनीति दूर नहीं होगी और सीबीआई बिना किसी के प्रभाव के स्वायत्तपूर्ण या स्वतंत्रतापूर्ण काम करना नहीं शुरू करेगी।24 साल पुराना बोफोर्स का मामला फिर से उजागर हुआ है, जिसमें विन चड्ढा और इटली के व्यापारी ओत्तावियो क्वात्रोची को   देने रिश्वत  का मामला सामने आया है। आयकर अपीलीय न्यायाधिकार ने फैसला सुना दिया है,कि सोनिया गांधी परिवार के नजदीकी चड्ढा और क्वात्रोची को बोफोर्स तोप बनाने वाली ४१ करोड़ रूपये की दलाली दी थी; और न्यायाधिकरण उन खातों का विवरण दे रहा है, जिन खातों से दलाली की रकम राजीव गांधी तक पहुचायीं गई। उस समय ये लेकर अब तक कांग्रेस और सीबीआई द्वारा मामले को दबाने की कोशिश  की गई थी और की जा रही है।
सीबीआई का तर्क है कि जांच में २५० करोड़ रूपये खर्च हो चुके है और बोफोर्स ऐसा मामला है,जिसकी जांच के लिये देश  में पहली बार जेपीसी भी बनी थी, लेकिन अब तक इस मामले को सुलझाया नहीं जा सका है। इससे संबद्ध विन चड्ढा, राजीव गांधी, एस.के.भटनागर, मार्टिन, हिन्दुजा बंधु छूट ही चुके हैं। 19 साल भारत में रहने के बाद 1993 में बचकर निकल चुका क्वात्रोची को सीबीआई पकड़ पाती है या नहीं, ये कहना तो मुश्किल  है; लेकिन एक बात तो तय है कि किसी भी ईमानदारी पूर्ण निर्णय की उम्मीद तभी की जाती है,जब मामलों से राजनीति दूर रहेगी और सीबीआई स्वतंत्रतापूर्ण काम करना शुरू करेगी।

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

भ्रष्टाचार बनाम भारत,जिम्मेदार कौन-जनता या प्रशासन ?

स्वतंत्रताप्राप्ति से लेकर अब तक नेताओं के भाषण से भ्रष्टाचार दूर करने के वादे अलग नहीं  रहते। तब से कितनी सरकारें आईं और गईं लेकिन कया वाकई स्थिति में कोई सुधार हुआ शायद  नहीं! जिसमें प्रशन  उठता है कि आखिर इसका जिम्मेदार कौन है? भ्रष्टाचार फैलाने वाले लोग,जिसमें अधिकतर लोग शासन   से जुड़े होते हैं अथवा उन्हें प्रशासन  या किसी उच्चाधिकारी या किसी नेता का संरक्षण प्राप्त होता है या फिर भ्रष्टाचार को न रोकने वाले लोग, जो अप्रत्यक्ष रूप से इसका फायदा उठाते है। लेकिन इससे प्रभावित कौन होता है हम या आप?
       अगर सरकार के फैसलों की बात करें, तो अब तक मात्र 6 प्रतिशत  मामलों में सजा हुई है, बाकी 94 प्रतिशत  दोषी सबूतों के अभाव में बच निकलते हैं। सबूतों के अभाव का प्रमुख कारण है, हमारे संविधान का गलत उपयोग। नियमों के अनुसार संवैधानिक पद पर आसीन अभियुक्त से जुड़े आपराधिक मामले की कार्यवाही नहीं हो सकती। वर्ष 2008 में भ्रष्टाचार उन्मुलन को प्राथमिकता देने की बजाय भारतीय दंड संहिता संषोधन विधेयक ये कहकर पारित किया गया, कि पुलिस अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 41 का दुरूप्योग कर रही है, जिस पर तीखी प्रतिक्रिया भी हुई।
    देश  घोटालों से भरा पड़ा है, जैसे उत्तर प्रदेश  पुलिस भर्ती घोटाला, जिसमें अठारह हजार छह सौ सिपाहियों और चौबीस आईपीएस अधिकारियों को बर्खास्त और निलंबित किया गया था। इसी प्रकार बिहार में बाढ़ पीड़ित सहायता और पुलिस वर्दी घोटाला 1989 में सामने आया, वहीं देश  का 70 लाख करोड़ रूपया विदेशी  बैंको में है, जिसे वापस लाने को लेकर कोई संतोषजनक कदम नहीं उठाया गया और जा रहा है। वहीं मंत्रियों और उच्चाधिकारियों के अलावा न्यायालय में भी भ्रष्टाचार के मामले सामने आये। जैसे; गाजियाबाद का भविष्यनिधि घोटाला, इलाहाबाद का उच्च न्यायालय में भ्रष्टाचार  को लेकर उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी, पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय से संबंधित 15 लाख नकद रिश्वत  का मामला, न्यायाधीश  सोमित्र सेन से जुड़ा मामला आदि। लेकिन ऐसे मामलों के खिलाफ पहले तो कदम उठाया नहीं जाता और जो कदम उठाता भी है, उसे मौत को गले लगाना पड़ाता है जैसे; अमित जेठवा।
     इन सब बातों से साफ जाहिर होता है, कि भ्रष्टाचार के बढ़ते कदमों के पीछे यदि जनता के लोगों को उसका दोषी माना जाता है, तो कहीं न कहीं इसके खिलाफ कोई कदम न उठाकर उसको बढ़ावा दे रहा है।

क्या वाकई जरूरी थी ये लड़ाई?


कोई भी मांगें बिना किसी लड़ाई के भी पूरी हो सकती हैं अगर तत्कालीन सरकारों द्वारा सही समय पर उचित निर्णय ले लिया जाय। इसी प्रकार अभी हाल ही में गुर्जर आन्दोलन के नाम से पनपी एक लड़ाई की बात करें, तो अशोक गहलोत की सरकार की भांति लिये गये निर्णय यदि वसुधंरा राजे के समय ही ले लिये गये होते, तो ये लड़ाई दोबारा न पनपती। मगर राजे सरकार ने गुर्जर समुदाय के अनुसूचित जनजाति में शामिल  किये जाने के वादे किये, जिससे गुर्जरों को जाट के बराबर सुविधायें उपलब्ध हो सकें परंतु वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री बनते ही राजे सरकार द्वारा यह मुद्दा पर विवादास्पद होने की वजह से इस पर कोई कदम नहीं उठाया। वहीं गुर्जरों द्वारा आंदोलन करने पर उन पर गोलियां चलवाने को आदेश  दे दिया, जिसमें 58 लोग मारे गये। जिसके बाद उन्होंने गुर्जरों के लिये सरकारी नौकरियों में 5 फीसदी आरक्षण की घोषणा कर दी। फिर अशोक  गहलोत की सरकार बनते ही उन्होंने संवैधानिक दायरे के अन्तर्गत एक फीसदी आरक्षण को लागू कर दिया। बाकी 4 फीसदी आरक्षण पर न्यायालय के फैसले के आने के बाद विचार करने का वादा किया।
  तो ऐसे मुश्किल  समय में सरकारों द्वारा जनता को अपनी बातों से संतुष्ट करना महत्वपूर्ण होता है। जरूरी नहीं उनकी गलत बात को भी मानें बल्कि उन्हें अपनी बात कहने का मौका दें और वहंी सही वक्त आने पर उन पर अमल किया जाय। अन्यथा खामियाजा सरकार से कहीं ज्यादा जनता को भुगतना पड़ता है क्योंकि सरकार को तो केवल विरोध झेलना पड़ता है लेकिन उनके बीच की जनता को उनके बीच रहकर उनके गुस्से का सामना भी करना पड़ता है।

क्या तासीर का हत्यारा है केवल कादरी ही!

पाकिस्तान में पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या उन्हीं के अंगरक्षक मलिक मुमताज़ हुसैन कादरी ने की। ये हत्या केवल गवर्नर की नहीं, बल्कि उन सभी नागरिकों की है, जो शांतिपूर्ण   और स्थिर समाज के लिये वार्ता पर विश्वास  रखते हैं उनका जुर्म केवल इतना था, कि उन्होंने पाकिस्तान के ईशनिंदा  विरोधी कानून को समाप्त करने की मांग की थी, जिसके अन्तर्गत इस्लाम का विरोध करने वाले किसी भी व्यक्ति को मौत की सजा़ सुना दी जाती थी। तासीर पाक राष्टपति जरदारी और उनकी बीवी बेनजीर भुट्टो, जो स्वयं 2007 में मार दी गई थी, उनके साथी थे। लेकिन लगता है कि ऐसी सोच रखने वालों को पाक में मौत का उपहार ही मिलता है। तासीर की हत्या से ये साफ हो जाता है, क्योंकि कादरी द्वारा लगातार 26 गोली से भूनने पर भी 8 सुरक्षाकर्मियों ने कोई कदम नहीं उठाया, जबकि इस बीच उसने अपनी राइफल की मैगजीन तक बदली। इसके अलावा ऐसे सुरक्षाकर्मियों को गवर्नर की सुरक्षा में लगाया था, जिसे वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा वीआईपी की सुरक्षा के लिये अयोग्य करार दिया जा चुका था। वहीं कादरी को कोर्ट में पेश  करने से पहले उसे मालायें आदि पहनाकर उसको सम्मान दिये जाने जैसी परिस्थितियां गवाह है कि पाक को सलमान के खोने का गम नहीं बल्कि ख़ुशी  है। ऐसी स्थिति में किसका विरोध किया जाय जरुर  छोड़ जाती है कि तासीर की हत्या के लिये क्या केवल सलमान जिम्मेदार है या इसके लिये और किसे सजा दी जानी चाहिये?

आखिर कौन उठायेगा तानाशाही के विरूद्ध मुहिम?

ये घटना किसी एक किसान, किसी एक गांव या फिर किसी एक इलाके की नहीं है बल्कि ये किसी भी ऐसी जगह घटित हो सकती है जहां सरकारी पदासीन या उच्च वर्ग के लोगों का स्तर निम्न वर्ग के लोगों की तुलना में इतना बड़ा हो जाये कि वे निम्नवर्ग के लोगों की जान की कीमत पैसों से भी छोटी समझने लगें?
ब्रिजीश   नगर निवासी एक किसान शिवप्रसाद ने बैंक से 4,80,000 का लोन लिया था, जिसको उसे ब्याज सहित लगभग 10 लाख चुकाना था। इस वर्ष जहां एक तरफ सर्दी के कारण उसकी सारी फसल जिसमें 4 एकड़ में चने, 1 एकड़ में सब्जी और 3 एकड़ में बोया गेहूं नष्ट हो गया वहीं दूसरी तरफ उसी गांव की महाराष्ट ऑफ बैंक के मैनेजर राजकुमार अहिरवार का लोन के चलते बीते 3 महीनों से किसी भी समय घर पर आकर डराना-धमकाना शिवप्रसाद  के मानसिक तनाव का कारण बना और उसने मौत का विकल्प चुना। घटना के दिन दोपहर 2 बजे भी अहिरवार शिवप्रसाद  से मिला और शाम  4 बजे षिवप्रसाद की लाष घर से थोड़ी दूर कुयें के पास मिली। इस सारे घटनाक्रम के बाद ये कह पाना मुश्किल  था, कि आखिर घटना का जिम्मेदार है कौन?
वो बैंक मैनेजर, जो घटना के बाद से ही छुट्टी पर चला गया और जिसका जवाब देने के लिये कोई तैयार नहीं या फिर सरकार की तरफ से पर्याप्त सुविधाएँ  उपलब्ध न कराये जाने से फसल का नष्ट होना, क्योंकि उस गांव में बिजली रात 12 बजे  के बाद आती है और सुबह 6-7 बजे तक चली जाती है, जिस समय में खेत को न तो सींचा जा सकता है न ही और कुछ काम किया जा सकता है। वहीं अगर सिंचाई के लिये पानी की बात करें; तो गांव के लोगों को बारिश  का इंतजार करना पड़ता है, जिससे वे लोग कुंयें में पानी बचाकर रखते हैं। इतनी सारी कठिनाइयों और असुविधओं के बीच जीते और देष में अन्न उपलब्ध कराने वाले इन किसानों की तरफ सरकार का ध्यान क्यों नहीं गया और दिन-ब-दिन बढ़ती किसान आत्महत्याओं के चलते अगर ध्यान गया भी, तो किसानों को मिला क्या-‘वादे और दिलासा’ !
 जी  हां! घटना के बाद दिलासा देने पहुंचे राजस्व मंत्री करनासिंह वर्मा ने बैंक लोन माफ करने के साथ-साथ बच्चों की मुफ्त  पढ़ाई और साथ में मुआवजा दिलवाने के वादे किये। जिसके एक हफता बीत जाने के बाद भी इस पर कोई कदम नहीं उठाया गया है। सबसे बड़ी विडम्बना है, कि बजाय उस परिवार या उसके जैसे परिवारों की सहायता करने के अगले दिन अखबार में आत्महत्या करने का कारण दिमागी रूप से असंतुलित होना बताया जाता है वो भी सरपंच रामसिंह वर्मा जो कि भाजपा पार्टी से संबंधित है उनके कहने पर कलक्टर द्वारा ये बयान दिया गया था। सरपंच, जो 10 से 15 दिन में भी शायद   ही शिवप्रसाद से मिलते होंगे, वहीं उससे रोजाना मिलने वालों के बयान को प्रशासन  या अखबार में कोई जगह नहीं मिलीं। एक परिवार या ऐसे कई परिवार जिन्हें आर्थिक सहायता की जगह मानसिक सहायता तो दूर, सही तरह से न्याय भी नहीं मिला; उल्टा मरने वालों को ही उसकी मौत का जिम्मेदार ठहरा दिया गया। जिससे षायद कोई संतुष्ट नहीं है सिवाय उन लोगों के जो असल में इसके जिम्मेदार है और सत्ता और शक्ति  भी उन्हीं के हाथ में है। लेकिन प्रष्न ये उठता है कि इनके खिलाफ आवाज कौन उठायेगा? हम या आप में से कोई! तो फिर क्यों पहल का इंतजार किया जाता है और फिर नई घटनाओं के घटित होने के बाद इन्हें भी भुला दिया जाता है। अगर ऐसी घटनाओं को अंजाम तक पहुंचाना हो या फिर दोहराव से बचाना हो, तो पहल हम में से ही किसी को करनी होगी? 

शनिवार, 20 नवंबर 2010

नौकरशाह, राष्ट्रामंडल खेल और भारतीय खिलाड़ी

 

1930 एक ऐसा दौर जब भारत गुलामी जन्जीरों को तोड़ने के लिए अपने बाजू मजबूत कर रहा था। भारत की हर गली आन्दोलकारियों की आवाज से गूंज रही थी। वहीं कैनेडा के एक शहर में राष्ट्रमण्डल खेलों की शुरूआत हुई थी। चौदह देशों के करीब 400 खिलाड़ियों ने छः खेलों में प्रतिभाग किया था। उस समय भारत ऐसे दौर से गुजर रहा था कि उसने ये सोचा भी नहीं होगा कि वह कभी राष्ट्रमण्डल खेलों की मेजबानी भी करेगा। लेकिन मात्र 21 साल के अन्दर भारत को ये मौका मिला उसके बाद १९८२ में। क्यों? शायद इसलिए कि भारत ने विश्व पर बहुत जल्दी अपनी एक अलग और प्रभावशाली छाप डाली है। इस वर्ष राष्ट्रमण्डल खेलों की शुरूआत भारत की राजधानी और दिल वालों के शहर दिल्ली में 3 अक्टूबर को हुई जो कि 13 अक्टूबर तक चले, जिसमें 71 राष्ट्र के 6700 प्रतिभागियों ने 17 खेलों के लिए भाग लिया। भारतियों में उस समय खुशी की लहर दौड़ गयी जब 2003 में भारत को वर्ष 2010 में राष्ट्रमण्डल खेलों की मेजबानी के लिए चुना गया। कहते हैं न कि हाथी के दांत खाने के कुछ और दिखाने के कुछ और होते हैं असल में भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष समेत अन्य सदस्यों के चहरे पर जो खुशी झलक रही थी उसका मुख्य कारण मेजबानी हासिल करने के पीछे छिपी शकुनी चाल का पहला चरण पार करने की थी। मतलब सभी अपने धन को कुबेर धन में तब्दील करने के सपने को साकार होता देख, खुश हो रहे थे। इन खेलों के बजट की गिनती बढ़ते-बढ़ते करीब 70000 करोड़ रूपये जा पहुंची है। कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर इस आंकड़े के आकार को समझाने के लिए इसकी तुलना देश भर के किसानों की कर्ज माफी पर खर्च करीब 65 हजार करोड़ रूपये से करते हैं तो कई लोग इसे केन्द्र सरकार के सालाना शिक्षा बजट से बड़ी राशि बताते हैं। एक बात यह भी सुनने में आती है कि खेलों के बदले जनता का पैसा लुटाने का सिलसिला भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष और राष्ट्रमण्डल खेल आयोजन समिति के महासचिव सुरेश कलमाडी ने वर्ष 2003 में जमैका में लगी बोली से शुरू कर दिया था। भारत की दावेदारी को मजबूत करने के लिए कलमाडी ने अपनी मर्जी से हरेक प्रतिभागी देश को एक-एक लाख डॉलर देने की पेशकश करी थी। भारत को वर्ष 2010 राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी मिलने में इस पेशकश ने अहम भूमिका निभाई। उस समय खेल मंत्री रहे भाजपा के विक्रम वर्मा कहते हैं ‘‘राष्ट्रमण्डल के सदस्य देशों को करीब 50-50 लाख रूपये देने की पेशकश कलमाडी का व्यक्तिगत निर्णय था। दरअसल यह मेजबानी हासिल करने के लिए दी जाने वाली रिश्वत थी।’’मेजबानी तो मिल गयी लेकिन वर्ष 2003 में मेजबानी मिलने के बाद वर्ष 2005 तक न तो भारतीय ओलंपिक संघ और न ही खेल मंत्रालय ने आयोजन को लेकर किसी भी तरह की तैयारी को आगे बढ़ाया। आयोजन के दावों और वादों के बीच चार साल निकल गये। आयोजन समिति का सचिवालय भी वर्ष 2007 में सुचारू हुआ। इसके बाद शुरू हुआ तैयारियों के बजाए खेलों के नाम पर ज्यादा से ज्यादा खर्च और कमाई से नए-नए तरीके निकालने का खेल। आयोजन का मास्टर प्लान तो वर्ष 2008 के आखिर में तैयार हुआ। इस देरी ने अटके कामों को पूरा करने का खर्च और धांधली की गुंजाइश दोनों को बढ़ा दिया। पिछले साल तक भी जमीनी तैयारियों पटरी पर नहीं दिखीं तो राष्ट्रमंडल खेल महासंघ के अध्यक्ष माइकल फेनेल ने इस सम्बन्धन प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी और अपनी चिंता जतायी। इसी बीच मीडिया ने राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार की कलाई खोलनी शुरू कर दी उदाहरण के तौर पर- पूर्व केन्द्रीय मन्त्री मणिशंकर अय्यर ने मीडिया में इस मुद्दे के उछलने के बाद खूलासा किया कि सुरेश कलमाडी ने 2003 में इन खेलों पर सिर्फ 150 करोड़ रूपये का खर्च आने की बात कही थी लेकिन अब उद् घाटन और समापन समारोह पर ही 300 करोड़ रूपये खर्च होने की बात कही गयी है।गलती तो धनलोलुप नेताओं और उनके चेलाओं ने तो जरूर की और मीडिया द्वारा, इस घोटाले का खुलासा भी होना अति आवश्यक था लेकिन ऐसे समय पर जब खेल शुरू होने में बस कुछ सप्ताह ही बाकी हों, मीडिया द्वारा इस मामले को तूल देना क्या सही था? क्योंकि मीडिया में इस मामले के उछलने के बाद विदेशों में ओलंपिक संघ के अध्यक्ष समेत भारत व भारतीय सरकार की थू-थू हुई। अब शायद ही भारत को राष्ट्रमण्डल खेल या अन्य अन्तर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं की मेजबानी के लिए अवसर मिले। वैसे ये कहा जा सकता है कि मीडिया ने नेताओं ने को नहीं छोड़ा और नेताओं ने देश को, लेकिन ऐसी स्थिति में सिर्फ एक वर्ग ही ऐसा था जिसने बिना किसी स्वार्थ, लालच के देश की शान को बरकरार रखा, देश के खिलाड़ी। खिलाड़ियों ने राष्ट्रमण्डल खेलों में कुल 101 पदक भारत के लिए प्राप्त किये। जिसमें 38 स्वर्ण, 27 रजत व 36 कांस्य हैं। बहरहाल काफी अव्यवस्थाओं के रहते हुए भी खेल सकुशल निपट गये और किसी भी घटना ने दस्तक भी नहीं दी। नहीं तो इसके पहले कई जगह निर्माण कार्य चल रहा था तो कहीं कार्य पूरा होने के बाद ढ़ांचा गिर रहा था।जो भी हो, अन्तिम समय में सरकार ने जब एक बार दम भरा तो काम पूरा करने के बाद ही सांस ली। ये बात अलग है कि एक आध छुट-पुट काम तब भी करने को बाकी रह गये थे। खिलाड़ियों की सुविधा के लिए एयरपोर्ट से ही एक अलग राजमार्ग बनवाया गया था जो खिलाड़ियों को सीधे स्टेडियम पर उतारने के लिए था। रोड के दोनों ओर बड़ी-बड़ी होर्डिंग लगवायी गयीं थी जिसमें तमाम प्रसिद्ध खिलाड़ियों की खेलते हुए तस्वीर थी, प्रसिद्ध इमारतों की तस्वीर आदि थी। उस समय तो दिल्ली मानों किसी अतिविकसित देश की भांति लग रही थी जहां न तो कहीं कूड़ा था और न ही कोई बिखारी। हां...... बिखारी! उन दिनों एक भी बिखारी दिल्ली की सड़कों पर नहीं था। ये भी सच है कि भारत में दिल्ली भी एक ऐसी जगह के तौर पर देखी जाती है जहां बिखारी बहुतायत में हैं। तो फिर ये बिखारी गये कहां? शहर से बाहर। अपनी झूठी शान बनाने के चक्कर में किसी भी बिखारी, रिक्शेवाले, ठेलेवालों को शहर में नहीं रूकने दिया गया। न ही शहर के बाहर उनके रहने खाने का कोई इन्तजाम किया गया। ऐसे में भीड़ भाड़ का तो कोई सवाल ही नहीं उठता है क्योंकि पूरा दिल्ली 10 दिन के लिए बंद करा दिया गया था।लेकिन सरकार के ये तमाम ढ़कोसले धरे के धरे रह गये। क्योंकि इस बार मीडिया ने इनकी करतूतों पर पानी फेर दिया। खेल खत्म होते ही अगले दिन भारत सरकार ने पूर्व महालेखा परीक्षक आयुक्त वी.के. शुंगलू समिति, खेलों में हुए भ्रष्टाचार की जांच के लिए गठित कर दी। इधर कई प्रकरणों के चलते विवादों में घिरी केन्द्र सरकार ने येन केन प्रकारेण सुरेश कलमाड़ी को उनके पद से मुक्त कर दिया। लेकिन प्रश्न ये उठा है कि इस तरह भारत की अस्मिता के साथ खेलने वाले व्यक्तियों की सजा सिर्फ पद से मुक्तिभर कर देना ही रह जाएगी या ऐसे आरोपियों पर कार्रवाई का ये पहला कदम माना जाए?