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शनिवार, 9 अप्रैल 2011

नवउदारवादी समाज में पनपता एक और गांधी

कम से कम इस समय तो इन्हें किसी परिचय की आवष्यकता नहीं है। जबकि पूरा समाज इनके समर्थन में है। जी हां यहां कि मीडिया ने भी अन्ना की आंधी में उड़े नेता, अन्ना के आगे झुकी सरकार और इनके द्वारा लड़ी जाने वाली लड़ाई को आजादी की दूसरी लड़ाई की संज्ञा देकर ‘किसन बाबूराव हजारे’ के समर्थन में अपना मत व्यक्त किया है। 40 रूपये में फूल बेचने से ड्राइवर बनने तक की कठिन यात्रा तय करने के बाद वर्तमान में अन्ना हजारे एक समाजसेवक हैं, जिनकी मंषा लोकतंत्र को जनलोकतंत्र बनाने की रही है। भारत पाक युद्ध में मौत को धता देने वाले हजारे सरकार को भी अपनी बात मनवाने में सफल हो गये हैं। लेकिन यहां अगर दूसरा पक्ष देखें, जो षायद उन मंत्रियों और सांसदों का पक्ष होगा। जोकि हम-आपके द्वारा चुनकर भेजे जाते हैं। तो लगता है कि ऐसी लड़ाईयों के पीछे कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि जब ये मंत्री और सांसद हमारे द्वारा ही चुनकर भेजे जाते हैं, तो बाद में इन्हें हटाने या इनके खिलाफ जांच के लिये लोकपाल बिल पारित करने के लिये कैंडिल मार्च, भूख हड़ताल और अनषन की आवष्यकता क्यों पड़ती है? 
 ये पूरा विवाद था लोकपाल बिल के बारे में, जिससे जनता और प्रषासन के बीच टकराव पैदा हो रहा हैै। इसके दो पक्ष हैं-एक जनता का लाभ और दूसरा सरकार के लिये चुनौती।
इस विधेयक में केन्द्र में लोकपाल और राज्य में लोकायुक्त होगा। ये संस्था निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरह स्वतंत्र होगी, जिससे किसी भी नेता या उच्चाधिकारी के खिलाफ जांच और बर्खास्तगी संभव हो पायेगी। इसके अलावा भ्रष्टाचारियों से मुआवजे के तौर पर धनवापसी भी हो सकेगी। इन मुख्य सुविधाओं के अलावा भ्रष्टाचार को रोकने लेकिन एक तरीके से सरकार के खिलाफ तमाम व्यवस्थायें हैं।
ये सारी चीजें कहीं से गलत नहंी हैै। लेकिन प्रषासन के लिये ये चुनौती क्यों साबित हो रही है? क्योंकि यहां पर सरकार की छवि पर एक तरह से प्रष्नचिन्ह लग जा रहा है। क्या आपको नहीं लगता कि बाद में किसी भी प्रकार की कार्यवाही की जगह चुनाव प्रक्रिया में सुधार और भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ मांग की जाने चाहिये थी! लेकिन ये मांग क्यों और कौन करेगा? क्योंकि इसके लिये सीधे हम जिम्मेदार होगें और हम अपने ही लिये क्यों मांग करेगें ? इसके लिये सरकार केवल नियम और कानून बना सकती है, जिसका पालन कितना होता है, सब जानते हैं। वो इस प्रकार का कोई विरोध नहंी करती, क्योंकि षायद वो जानती है, कि इसके चलते हमारे देष पर भी मिश्र और ट्वीनीषिया जैसी लड़ाईयों का धब्बा लगता है और ये सोचना पड़ेगाा कि इस प्रकार के कदमों से देष और प्रषासन की विष्व में छवि की क्षति के लिये फिर हम किस देष में धरना प्रदर्षन करेगें?

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

बेटियों के बिना होगा विकास?

बेटो की भीड़ में बेटी अकेली
बेटे के जन्म पर ढोलक बजना और बेटी के जन्म पर अफसोस करने जैसी बातें आपने पहली बार नहीं सुनी होगी, लेकिन ये नया जरूर है कि आज भी देष में ऐसी ही सोच अपनी जगह बनाये हुये है। अभी हाल ही में राष्ट्रीय स्तर पर हुई जनगणना में भले ही साक्षरता दर में वृद्धि होकर 75 प्रतिषत हो गई हो और जनसंख्या वृद्धि में कमी आई हो। लेकिन सोच आज भी वही पुरानी है, कि पुरूष महिलाओं से श्रेष्ठ होते हैं। इसका प्रमाण भी सामने आया है कि हर 1000 बेटों पर 914 बेटियां का जन्म होंता है। वहीं राष्ट्रीय स्तर पर यदि महिलाओं का स्थान देखें तो वो हर 1000 पुरूषों पर 940 महिलायें हैं। देष में बिहार, गुजरात और जम्मू कष्मीर में पुरूषों की अपेक्षा महिलाओं की संख्या सबसे कम है। सरकार को यहां गौर करना चाहिये कि उनके द्वारा बनाई गई लाडली लक्ष्मी योजना, परिवार नियोजन जैसी तमाम योजनायें केवल बनाने मात्र से कोई हल नहीं निकलने वाला है, बल्कि उसे पालन कराने की आवष्यकता भी है। ये स्थिति देष के स्वतंत्र के बाद से षुरू हो गई थी। इसका मतलब तो यही निकाला जा सकता है कि देष ने इसी सोच के साथ विकास के दौर में कदम रखा था, जिसका पालन वो आज भी कर रहा है। यदि स्थिति में जल्द ही कोई परिवर्तन नहंी हुआ तो भारत माता के नाम से पुकारे जाने वाले भारत में मातायें ही नहीं बचेगीं।
 

गुरुवार, 31 मार्च 2011

आखिर किसे है परवाह?

 30 जनवरी, 2011 की दोपहर होते ही, सडको पर सन्नाटा, सारी दुकानें बंद, बीच-बीच में कभी कभी गाड़ियों की आवाजें सुनाई पड़ रही थीं। ऐसा लग रहा था कि कोई बड़ा फैसला सुनाया जाने वाला हो या किसी और महत्वपूर्ण निर्णय का इंतजार हो। लेकिन वास्तव में ये षांति उस षोर का इंतजार कर रही थी जो इंडिया के जीतने के बाद गूंज उठने वाला था और ये जीत इसलिये महत्वपूर्ण थी, क्योंकि ये जीत पाकिस्तान के खिलाफ वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल के लिये थी।
मैच का ये जज़्बा न ही नया है और न ही गलत, परन्तु इस जज्बे और जोष के आगे देष और उसकी जरूरतों को नज़रअंदाज करना कहां तक सही है। यहां कितने लोगों को रुचि है कि भारत आने पर गिलानी से 26/11 के कैदियों के बारे में बात की जाय क्योंकि उन लोगों को अभी सजा नहंीं हुई है या फिर मनमोहन और गिलानी के बीच दोनों देषों के बीच संबंधों के सुधार को लेकर या और कोई औपचारिक वार्ता हो। क्योंकि केवल साथ बैठकर मैच देखने से किस तरह संबंधों में सुधार होगा! किसी ने इस संबंध में सोचकर वक्त ज़ाया करना जरुरी नहंी समझा। ‘‘अगर पाकिस्तान के राष्टपति आसिफ अली जरदारी और प्रधानमंत्री गिलानी षांति के नाम पर मोहाली पर मैच देखने आ सकते हैं तो मुंबई हमले के दोषी कसाब और संसद पर हमले के जिम्मेदार अफजल गुरु के साथ नाइंसाफी क्यों?’’ बाल ठाकरे के इस बयान के बाद भी कोई संतोषजनक निर्णय न लेना इस वाकये को सही ठहरा रहा है।  

रविवार, 13 मार्च 2011

संस्कृति पर खर्च मंजूर नहीं!




सुनने में अजीब लगता है कि ‘‘बदलते दौर में संस्कृति या सभ्यता की बात करने वाले को विरोध का सामना कर पड़ रहा है।’’ आज के समाज पर जरूरतें और इच्छाओं उनकी संस्कृति और सभ्यता पर हावी हाती दिखाई पड़ रही हैं और वहीं किसी व्यक्ति या समूह को दादा या बाबा की याद गई तो उसे भी चुप करने के भरसक प्रयास किये जाने षुरू हो जाते हैं। अगर अभी ज्वलंत मुद्दा का ही उदाहरण ले लें, ‘भोपाल के नाम परिवर्तित करके भोजपाल करने का।’ तो इसका विरोध किया गया। इस बड़े विरोध का मुख्य कारण था- मीडिया द्वारा  नाम बदलने का कारण मुख्यमंत्री शिवराज  सिंह चौहान ने कोई विकास का मुद्दा न होकर ‘पूर्वजों और इतिहास वीरों का सम्मान’ का सम्मान बताया। बगैर इसका कारण जाने और राजा भोज के योगदान का पता लगाये लोगों ने विरेाध जताना शुरू  कर दिया, वहीं राजनीतिज्ञ मामले को अपने पक्ष में करने की खुड़पेंच में लग गये। 
   ये बात कहीं से गलत नहीं है, कि इस वर्ष ‘म.प्र. में किसानों की बढ़ती आत्महत्या और महंगाई’ महत्त्वपूर्ण मुद्दे रहे। बस मुख्यमंत्री जी ने यहीं पर गलती कर दी कि उन्होंने अपने पूर्वजों को बिना किसी संकट या ठोस वजह के याद कर लिया। तो जनता ने भी बिना इतिहास या प्रस्ताव का कारण जाने बिना केवल एक पक्ष को देखते हुये विरोध करना शुरू  कर दिया। लोग इस मुद्दे के ऐसे पहलुओं को नकारात्मक मान रहे हैं जैसे ‘म.प्र. में किसान आत्महत्या’ जो समाज में पहले से ही था, ‘मूर्ति निर्माण’ या ‘भोपाल का नाम परिवर्तन’ न तो इन समस्याओं का कारण है और न ही इस प्रकार की पहल से समाज में व्याप्त इन समस्याओं के हल में कोई रूकावट आयेगी। इसके अलावा समाज में व्याप्त इन समस्याओं के लिये भी पर्याप्त कदम उठाये जा चुके हैं, चाहे वह ‘किसानों को दिया गया राहत कोष हो’ या ‘राज्य बजट में किसानों के लिये उपलब्ध कराई गई राशी ’। 
   वहीं अगर इस पहल के सकारात्मक पक्ष की बात करें, कि एक तो सांस्कृतिक दृष्टि से राज्य की देश  और विदेश  में एक अलग पहचान बनेगी ही और ये संस्कृति या सभ्यता की दिशा में पहल होगी। लोग भी पूर्वजों के महत्त्व को समझ पायेंगे! और तय कर पायेंगे कि उन्हें भविष्य में पहचान बनाने के लिये क्या कदम उठाने चाहिये? वहीं आर्थिक दृष्टि से देखें तो इसके प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ भोज की प्रतिमा ‘टूरिज्म’ की एक वजह बन सकती है। अब आते हैं भोज के योगदान पर तो सबसे पहले जान लें कि ‘‘कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली’’ जैसी कहावतें उन्हीं की वज़ह से समाज में आईं, जब उन्होंनें चालुक्य राजा तैलप को हराया था। इससे सिद्ध होता है, कि राजा भोज एक पराक्रमी राजा थे जिन्होंने वर्षों तक अपने इस राज्य की रक्षा की और वाह्य आक्रमणो से बचाया है। पराक्रमी होने के साथ साथ वे परम ज्ञानी भी थे, क्यूंकि उन्होंने रोबोट, लिफट,जहाज और विमान निर्माण बनाने की विधि का जिक्र अपने ग्रन्थों में किया है और अपनी रचना ‘समरांगण सूत्रधार’ में नगर रचना, भवन रचना और मुर्ति रचना का उल्लेख किया है। ऐतिहासिक महत्व के रूप में उन्होंने 84 ग्रन्थों की रचना की है, जिसके प्रमाण उज्जैन के संग्रहालय में  आज भी विद्यमान है और निर्माण के क्षेत्र में भोजपुर का महान शिव  मंदिर, उज्जैन में माण्डन का किला और तत्कालीन राजधानी धार में 42 फीट उंचा लौह स्तंभ, जिसकी खासियत है कि इस पर कभी जंग नहीं लगती, का निर्माण इन्होंने ही करवाया। वहीं अगर विकास के क्षेत्र की बात करें, तो  बेतवा नदी पर 250 वर्ग मील क्षेत्रफल का विषाल बांध राजा भोज की ही देन है। वहीं राष्टीय स्तर पर रामेश्रम , सोमनाथ, केदार, मुंडीर और चित्तौड़ का त्रिभुवन नारायण मंदिर के अलावा कश्मीर  में कप्तेस्वेर  मंदिर आदि का निर्माण कराके उन्होंने धार्मिक क्षेत्र में अपना योगदान सिद्ध किया। और अन्तर्राष्टीय स्तर भी इनके महत्त्व से अछूता नहीं है, भोजशाला  की सरस्वती प्रतिमा, इंग्लैण्ड के ब्रिटिश  म्यूजियम में रखी हैं उसे लाने के प्रयास 1961 से हो रहे हैं। अंतर्राष्टीय स्तर पर  पुरातत्वविद पद्म श्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने नेहरू जी से मुलाकात की थी। इसके अलावा उनके बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात है कि चूंकि वे वास्तुशास्त्र  के ज्ञाता थे तो उन्होंने पूरे शहर  का निर्माण वास्तुशास्त्र के अनुरूप कराया था। वहीं आज लोग ये तक बात कर रहे हैं कि उनकी मूर्ति स्थापित करना वास्तुशास्त्र  के हिसाब से ठीक नहीं है ये नगर के लिये फलदायी नहीं है । ये सब जानकर हमें विरोध की कदम न बढ़ाकर ये सुकर  मनाना चाहिये कि राजा भोज अपने राज्य की शुरूआत मालवा से करके भोपाल और मध्य प्रदेश तक विस्तार करके यहां विकास कार्य कराया और इसे उन्नत करने के साथ इसे अपना नाम दिया- ‘भोजपाल’ अर्थात् जिस स्थान को पालने वाला भोज हो। इन सब चीजों को याद करने का एक तरीका अगर जगह का नाम बदलना हो, तो इसका विरोध किया जाना कितना सही है? क्या उनके इतने योगदान के बदले उन्हें एक नाम भी नहीं दिया जा सकता। कहा जाता है कि संस्कृति और सभ्यता समाज की पहचान होती है, तो इस तरह के विरोध का क्या मतलब निकाला जा सकता है, कि समाज की आवशकताओं पहचान पर हावी हो रही है या फिर आने वाली पीढ़ी में वो खुद को स्थान नहीं देना चाहते?




गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

राजनीति से दूर रहकर करनी होगी जांच

 घोटालों का बढ़ता क्रम चाहे वह २४ साल पुराना बोफोर्स का मामला हो या हाल ही में हुआ अब तक का सबसे बड़ा घोटाला 2-जी स्पेक्टम घोटाला, तब तक अपने निष्कर्ष पर नहीं पहुंचेगा जब तक इन मामलों से राजनीति दूर नहीं होगी और सीबीआई बिना किसी के प्रभाव के स्वायत्तपूर्ण या स्वतंत्रतापूर्ण काम करना नहीं शुरू करेगी।24 साल पुराना बोफोर्स का मामला फिर से उजागर हुआ है, जिसमें विन चड्ढा और इटली के व्यापारी ओत्तावियो क्वात्रोची को   देने रिश्वत  का मामला सामने आया है। आयकर अपीलीय न्यायाधिकार ने फैसला सुना दिया है,कि सोनिया गांधी परिवार के नजदीकी चड्ढा और क्वात्रोची को बोफोर्स तोप बनाने वाली ४१ करोड़ रूपये की दलाली दी थी; और न्यायाधिकरण उन खातों का विवरण दे रहा है, जिन खातों से दलाली की रकम राजीव गांधी तक पहुचायीं गई। उस समय ये लेकर अब तक कांग्रेस और सीबीआई द्वारा मामले को दबाने की कोशिश  की गई थी और की जा रही है।
सीबीआई का तर्क है कि जांच में २५० करोड़ रूपये खर्च हो चुके है और बोफोर्स ऐसा मामला है,जिसकी जांच के लिये देश  में पहली बार जेपीसी भी बनी थी, लेकिन अब तक इस मामले को सुलझाया नहीं जा सका है। इससे संबद्ध विन चड्ढा, राजीव गांधी, एस.के.भटनागर, मार्टिन, हिन्दुजा बंधु छूट ही चुके हैं। 19 साल भारत में रहने के बाद 1993 में बचकर निकल चुका क्वात्रोची को सीबीआई पकड़ पाती है या नहीं, ये कहना तो मुश्किल  है; लेकिन एक बात तो तय है कि किसी भी ईमानदारी पूर्ण निर्णय की उम्मीद तभी की जाती है,जब मामलों से राजनीति दूर रहेगी और सीबीआई स्वतंत्रतापूर्ण काम करना शुरू करेगी।

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

भ्रष्टाचार बनाम भारत,जिम्मेदार कौन-जनता या प्रशासन ?

स्वतंत्रताप्राप्ति से लेकर अब तक नेताओं के भाषण से भ्रष्टाचार दूर करने के वादे अलग नहीं  रहते। तब से कितनी सरकारें आईं और गईं लेकिन कया वाकई स्थिति में कोई सुधार हुआ शायद  नहीं! जिसमें प्रशन  उठता है कि आखिर इसका जिम्मेदार कौन है? भ्रष्टाचार फैलाने वाले लोग,जिसमें अधिकतर लोग शासन   से जुड़े होते हैं अथवा उन्हें प्रशासन  या किसी उच्चाधिकारी या किसी नेता का संरक्षण प्राप्त होता है या फिर भ्रष्टाचार को न रोकने वाले लोग, जो अप्रत्यक्ष रूप से इसका फायदा उठाते है। लेकिन इससे प्रभावित कौन होता है हम या आप?
       अगर सरकार के फैसलों की बात करें, तो अब तक मात्र 6 प्रतिशत  मामलों में सजा हुई है, बाकी 94 प्रतिशत  दोषी सबूतों के अभाव में बच निकलते हैं। सबूतों के अभाव का प्रमुख कारण है, हमारे संविधान का गलत उपयोग। नियमों के अनुसार संवैधानिक पद पर आसीन अभियुक्त से जुड़े आपराधिक मामले की कार्यवाही नहीं हो सकती। वर्ष 2008 में भ्रष्टाचार उन्मुलन को प्राथमिकता देने की बजाय भारतीय दंड संहिता संषोधन विधेयक ये कहकर पारित किया गया, कि पुलिस अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 41 का दुरूप्योग कर रही है, जिस पर तीखी प्रतिक्रिया भी हुई।
    देश  घोटालों से भरा पड़ा है, जैसे उत्तर प्रदेश  पुलिस भर्ती घोटाला, जिसमें अठारह हजार छह सौ सिपाहियों और चौबीस आईपीएस अधिकारियों को बर्खास्त और निलंबित किया गया था। इसी प्रकार बिहार में बाढ़ पीड़ित सहायता और पुलिस वर्दी घोटाला 1989 में सामने आया, वहीं देश  का 70 लाख करोड़ रूपया विदेशी  बैंको में है, जिसे वापस लाने को लेकर कोई संतोषजनक कदम नहीं उठाया गया और जा रहा है। वहीं मंत्रियों और उच्चाधिकारियों के अलावा न्यायालय में भी भ्रष्टाचार के मामले सामने आये। जैसे; गाजियाबाद का भविष्यनिधि घोटाला, इलाहाबाद का उच्च न्यायालय में भ्रष्टाचार  को लेकर उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी, पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय से संबंधित 15 लाख नकद रिश्वत  का मामला, न्यायाधीश  सोमित्र सेन से जुड़ा मामला आदि। लेकिन ऐसे मामलों के खिलाफ पहले तो कदम उठाया नहीं जाता और जो कदम उठाता भी है, उसे मौत को गले लगाना पड़ाता है जैसे; अमित जेठवा।
     इन सब बातों से साफ जाहिर होता है, कि भ्रष्टाचार के बढ़ते कदमों के पीछे यदि जनता के लोगों को उसका दोषी माना जाता है, तो कहीं न कहीं इसके खिलाफ कोई कदम न उठाकर उसको बढ़ावा दे रहा है।

क्या वाकई जरूरी थी ये लड़ाई?


कोई भी मांगें बिना किसी लड़ाई के भी पूरी हो सकती हैं अगर तत्कालीन सरकारों द्वारा सही समय पर उचित निर्णय ले लिया जाय। इसी प्रकार अभी हाल ही में गुर्जर आन्दोलन के नाम से पनपी एक लड़ाई की बात करें, तो अशोक गहलोत की सरकार की भांति लिये गये निर्णय यदि वसुधंरा राजे के समय ही ले लिये गये होते, तो ये लड़ाई दोबारा न पनपती। मगर राजे सरकार ने गुर्जर समुदाय के अनुसूचित जनजाति में शामिल  किये जाने के वादे किये, जिससे गुर्जरों को जाट के बराबर सुविधायें उपलब्ध हो सकें परंतु वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री बनते ही राजे सरकार द्वारा यह मुद्दा पर विवादास्पद होने की वजह से इस पर कोई कदम नहीं उठाया। वहीं गुर्जरों द्वारा आंदोलन करने पर उन पर गोलियां चलवाने को आदेश  दे दिया, जिसमें 58 लोग मारे गये। जिसके बाद उन्होंने गुर्जरों के लिये सरकारी नौकरियों में 5 फीसदी आरक्षण की घोषणा कर दी। फिर अशोक  गहलोत की सरकार बनते ही उन्होंने संवैधानिक दायरे के अन्तर्गत एक फीसदी आरक्षण को लागू कर दिया। बाकी 4 फीसदी आरक्षण पर न्यायालय के फैसले के आने के बाद विचार करने का वादा किया।
  तो ऐसे मुश्किल  समय में सरकारों द्वारा जनता को अपनी बातों से संतुष्ट करना महत्वपूर्ण होता है। जरूरी नहीं उनकी गलत बात को भी मानें बल्कि उन्हें अपनी बात कहने का मौका दें और वहंी सही वक्त आने पर उन पर अमल किया जाय। अन्यथा खामियाजा सरकार से कहीं ज्यादा जनता को भुगतना पड़ता है क्योंकि सरकार को तो केवल विरोध झेलना पड़ता है लेकिन उनके बीच की जनता को उनके बीच रहकर उनके गुस्से का सामना भी करना पड़ता है।

क्या तासीर का हत्यारा है केवल कादरी ही!

पाकिस्तान में पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या उन्हीं के अंगरक्षक मलिक मुमताज़ हुसैन कादरी ने की। ये हत्या केवल गवर्नर की नहीं, बल्कि उन सभी नागरिकों की है, जो शांतिपूर्ण   और स्थिर समाज के लिये वार्ता पर विश्वास  रखते हैं उनका जुर्म केवल इतना था, कि उन्होंने पाकिस्तान के ईशनिंदा  विरोधी कानून को समाप्त करने की मांग की थी, जिसके अन्तर्गत इस्लाम का विरोध करने वाले किसी भी व्यक्ति को मौत की सजा़ सुना दी जाती थी। तासीर पाक राष्टपति जरदारी और उनकी बीवी बेनजीर भुट्टो, जो स्वयं 2007 में मार दी गई थी, उनके साथी थे। लेकिन लगता है कि ऐसी सोच रखने वालों को पाक में मौत का उपहार ही मिलता है। तासीर की हत्या से ये साफ हो जाता है, क्योंकि कादरी द्वारा लगातार 26 गोली से भूनने पर भी 8 सुरक्षाकर्मियों ने कोई कदम नहीं उठाया, जबकि इस बीच उसने अपनी राइफल की मैगजीन तक बदली। इसके अलावा ऐसे सुरक्षाकर्मियों को गवर्नर की सुरक्षा में लगाया था, जिसे वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा वीआईपी की सुरक्षा के लिये अयोग्य करार दिया जा चुका था। वहीं कादरी को कोर्ट में पेश  करने से पहले उसे मालायें आदि पहनाकर उसको सम्मान दिये जाने जैसी परिस्थितियां गवाह है कि पाक को सलमान के खोने का गम नहीं बल्कि ख़ुशी  है। ऐसी स्थिति में किसका विरोध किया जाय जरुर  छोड़ जाती है कि तासीर की हत्या के लिये क्या केवल सलमान जिम्मेदार है या इसके लिये और किसे सजा दी जानी चाहिये?